बिंदी वाली गुड़िया
ठाणे से जिस लोकल में वो चढ़ा था ... एक तो रात के कोई 9 बज रहे थे .... ऊपर से पहला दर्जा होने के कारण भीड़ भी नहीं थी।.... मुलुंड स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन रुकी ...एक 9-10 साल की मासूम सी लड़की अपने छोटे छोटे हाथों में कुछ ड्रॉइंग बुक्स ले कर चढ़ी।.... सांवले गेहुएँ रंग पर तंग हरा सलवार सूट, गुलाबी दुपट्टा, हाथों में प्लास्टिक की चूड़ियाँ और माथे पर चमकीली बिंदी उसे कुछ समझदार व्यक्तित्व दे रहे थे । पैरों में सुंदर वेशभूषा के अनुरूप ही चमकदार जूतियाँ। जैसे परीलोक से कोई छोटी सी परी अपना सब कुछ छोड़ बम्बई की इस लोकल ट्रेन में ड्रॉइंग बुक्स बेचने उतर आई हो।.....पचास की तीन!!, ....सौ की छः!! ....... पचास की तीन!!,.... सौ की छः!!....पुकारते पुकारते ठीक उसके सामने बैठ गयी, ....उसे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई और बच्ची के चेहरे पर एक अजीब सी चमक।......."ले लो अंकल प्लीज़ ले लो! अंकल !!! प्लीज़ अंकल!! ले लो ना!!!!" ........उसके घुटने को अपने छोटे से हाथ से बार बार थपथपाते हुए , गर्दन टेढ़ी करके विनती के स्वर में वो कहती जा रही थी।....एक दो बार मुस्कुरा कर उसने मना किया.......