स्पेशल मोमेंट - डी ए वी स्कूल, श्रीगंगानगर
बात 2005 की है। डी ए वी स्कूल श्रीगंगानगर, 11वीं कक्षा में मेडिकल में दाखिला लिया था मैंने। (ये उस जमाने की बात है जब मैट्रिक के अंक आपकी किस्मत तय किया करते थे या दूसरे शब्दों में कहूँ तो घर वालों को आपकी किस्मत तय करने का मौका दिया करते थे) नया स्कूल था और मैं अकेला सरदार। घर पर कट्टर माहौल नहीं था इसलिए खालसा या हरकृष्ण स्कूल का रिस्क नहीं लिया उन्होंने। सरस्वती स्कूल से मैट्रिक तक की पढ़ाई में भी तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी की जगह संस्कृत ही थी मेरे पास। गुरमुखी तो मैंने घर पर ही सीख ली थी। ....... खैर 2005 पर आते हैं ....डी ए वी स्कूल, जाटों बिश्नोईयों के लंबे चौड़े बागड़ी बोलने वाले लड़के। स्कूल में टीचर को गुरुजी बोलने का रिवाज़। ......टीचर्स में भी जाट बिश्नोईयों की ही मोनोपॉली थी और हिंदी की बजाय बागड़ी बोलने वाले छात्रों के साथ विशेष सहानुभूति दिखाई जाती थी। लड़कों का स्कूल था तो जाहिर सी बात थी कि शिक्षक ही थे, शिक्षिका कोई थी नहीं और अनुशासन के नाम पर लड़कों को जंगली साँड समझ कर डंडे से ही हाँका जाता था, प्रार्थना सभा हो या क्लास रूम, थोड़ी सी गलती का जवाब थप्पड़ या डंडा ही होता ...