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“ तू तो शाहीन है “

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   फ़ोटो - ग्रीन पार्क एक्सटेन्शन , दिल्ली , जनवरी 2019 का लेकिन फ़ोटो खिंचवाते हुए 20 सितम्बर 2017 की शाम याद आ गई जब डल झील (श्रीनगर) के किनारे इंटेलिजेन्स ऑफ़िस के कुछ साथियों और सीनियर्स के साथ टहल रहा था तो सबकी फ़रमाइश पर अरिजित सिंह का गाया गाना ‘ख़ामोशियाँ’ सुनाया और अपनी लिखी एक नज़्म पेश की तो जम्मू ऑफ़िस के रणजीत सिंह सर मुझे देख कर बोले .....”डॉक्टर साब ! कहाँ आ गये आप ?...आपको देख कर मुझे इक़बाल का लिखा एक शे’र याद आ गया है।” मैं थोड़ा मुस्कुराया और पूछा कि कौनसा ? (उस समय तक इक़बाल को सिवाय ‘सारे जहाँ से अच्छा’ और इक्का दुक्का नज़्मों के अलावा कुछ ख़ास नहीं पढ़ा था मैंने) वो बोले - “नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर                 तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में “ उनके ये शब्द एक सुंदर कॉम्प्लिमेंट की तरह मेरे कानों में आज भी गूँज जाते हैं तो अपने ऊपर थोड़ा इतरा भी लेता हूँ 🙂 🙂 कुछ कुछ कॉम्प्लिमेंट्स कितने सुंदर और पाक दिल से कहे होते हैं ना ? (शाहीं यानि बाज़ और इसकी उड़ान से तभी से मुझे प्या...