नानक से गुरु नानक
नानक और कबीर समकालीन थे और भी कई मायनों में इनका कोई सानी नहीं। ये दोनों ही किसी राजा के बेटे नहीं थे। ना किसी संप्रदाय के प्रणेता या प्रचारक ही थे। इनका संप्रदाय था समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों की फफूँद को साफ़ कर उजियारा करना। ठगी, बेईमानी, हिंसा, क्रोध, द्वेष के भेद खोल कर जनमानस को मानवता का पाठ पढ़ाना। यही बात नानक को गुरु नानक बनाती है। वो व्रत जैसे आडम्बरों का विरोध करते कहते हैं। “छोडै अन्न करै पखंड, ना ओ सुहागन ना ओ रंड” यही बात गुरु नानक को दुनिया के सबसे नवीनतम, सबसे एडवांस सबसे अप्डेटेड संप्रदाय का संस्थापक मानती है। नानक और कबीर अपने समय के सिर्फ़ संत नहीं थे, वे संत भी हैं और स्कॉलर भी। विचारक भी हैं, तर्कशील भी। “ख़सम विसारे ते कमजात नानक नावै बाझ सनात” वे सदी से आगे की बात करने वाले वैज्ञानिक भी हैं और दार्शनिक भी। वो फ़ेमिनिस्ट भी हैं और फ़िलैन्थ्रॉपिस्ट भी। नारी के लिए वे लिखते हैं। “सो क्यों मंदा आख़िए जित जम्मे राजान।” ( उसे क्यूँ बुरा कहना जिसने राजाओं तक को पैदा किया है) वे बाबर जैसे शासक का अहंकार तोड़ने के लिए उसकी जेल में क...