शर्मनाक सिस्टम
दिसम्बर 2012 में 'दिल्ली सामूहिक बलात्कार प्रकरण' से व्यथित हो कर पहली बार लोग सड़कों पर आये थे....किसी लड़की के लिए.....यहाँ 'लड़की' शब्द पर जोर इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि ये मेरा देश 'भारतवर्ष' है जहाँ लड़की के नहीं लड़के के जन्म पर लड्डू बंटते है....थाली बजती है....ढोल पीटे जाते हैं....खुसरे-बाजीगर-छुरीमार बधाई लेने आते हैं। लड़के को जन्म देने वाली माँ की इज़्ज़त ससुराल में बढ़ जाती है.....पूरे मोहल्ले-रिश्तेदारी में गला-काट स्पर्धा में उत्तीर्ण जो हुई होती है। दूसरी ओर लड़की को जन्म से ही पनौती/बोझ/भार/जिम्मेदारी/बेगाना धन/पराई इत्यादि नामों से नवाज़ के अपने ही घर में पराया या यूं कहूँ द्वितीय दर्जे की नागरिकता दे दी जाती है।......ठीक ठाक पढ़ लिख जाए तो ठीक नहीं तो जबरन शादी करवा कर ताउम्र के लिए मनोबल तोड़ दिया जाता है।.....अगर वो पढ़ लिख कर खुद के पैरों पर खड़ी हो कमाने लग जाये तो या तो घर परिवार वाले उसके आगे पीछे रिरिया कर उस पर निर्भर हो जाते हैं या उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए हर सम्भव अपशब्द से नवाजते हैं।.....बात कर रहा था 2012 दिल्ली सामूहि...