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सफ़र के सुनहरी क़िस्से (स्वर्ण मंदिर एक्सप्रेस)

डायरी/25 जनवरी 2018 अभी कुछ देर पहले स्वर्ण मंदिर एक्सप्रेस रेल में सफर करते हुए एक अजीब से वाकये से रूबरू हुआ।मेरी बर्थ के नीचे एक बड़ा सा लाल रंग का सूटकेस पड़ा देखा। आस पास के लोगों से पूछने पर पता चला कि उनमें से किसी का भी वो सूटकेस नहीं है।.... थोड़ी हैरानी सी हुई , फिर सोचा जिसका भी होगा ,गाडी चलने पर पता चल जाएगा.......जैसे ही रेल प्लेटफॉर्म से छूटी, मैंने देखा कोई भी नहीं आया। हर आता जाता शख्स मेरी शक की सुई से पिरोया जा रहा था।.... आनन फानन में मैंने कण्ट्रोल रूम में फोन कर सूचना दे दी,.... कुछ रेलवे पुलिस का स्टाफ भी वहीँ चेकिंग पर था,  मैंने अपना संक्षिप्त परिचय दे उनको भी इस बारे में बताया.... देखते ही देखते उनका एक बूढ़ा इंस्पेक्टर अपने 6-7 हेड कांस्टेबल , कांस्टेबल के साथ वहां आया और सूटकेस को अगले स्टेशन (ब्यास) पर उतार कर चेक करने का प्लान बनाने लगा.... 26 जनवरी -गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या होने का संयोग इस वाकये को और आशंकित बना रहा था....  निगाहें उस सूटकेस पर टिकी हुई थी, 15 मिनट में ही बुरे विचार घर कर रहे थे।....अभी जाने हम सब क्या क्या सोच ही रहे थे ...

माँ का तोहफ़ा

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दिन था 04 मई 2015 - मेरा जन्मदिन। जगह - ऐ. जी. ऑफिस, नागपुर, यानि कि मेरी पहली कर्मस्थली। जन्मदिन की मिठाई सबको खिला कर दोपहर लंच करके अपनी सीट पर पहुँचा ही था कि एक सहकर्मी ने बताया कि "गुरप्रीत! तेरे लिए एक पार्सल आया है।".....एकबारगी हैरत सी हुई कि आधा दिन बीत चुका है और यहाँ घर से दूर महाराष्ट्र में किसने मेरे ऑफिस में कुछ मेरे लिए भेजा होगा। ख़ैर, पता किया तो एक डेढ़- दो फीट लम्बा कार्ड जैसा कोई पार्सल देख कर हैरानी सी हुई।....... ऊपर नाम और पता लिखा था एक फेसबुक मित्र का। लिफ़ाफ़ा खोलने से अंदाज़ा सही निकला। एक डेढ़ -दो फीट लम्बा चौड़ा बर्थडे कार्ड ही था। लेकिन जिस शिद्दत और मुहब्बत से इसे सजाया गया था मेरी आँखों में आँसू आये बिना नहीं रह सके।....... एक बाज़ारी कार्ड को कस्टमाइज़ करके मेरी फेसबुक प्रोफाइल से ढेर सारी बचपन और अब की तस्वीरों को प्रिंट करवा कर कार्ड में इस सलीके से चिपकाया गया था कि क्या बताऊँ। हर एक पृष्ठ पर तस्वीर के साथ ढेर सारी ममता उड़ेल रखी थी।.......ये क्रांति कीर्ती जी हैं जो मन ही मन मुझे अपना बेटा मान चुकी हैं ......जिन्होंने ऐसा किया। और एक पे...