माँ का तोहफ़ा
दिन था 04 मई 2015 - मेरा जन्मदिन। जगह - ऐ. जी. ऑफिस, नागपुर, यानि कि मेरी पहली कर्मस्थली। जन्मदिन की मिठाई सबको खिला कर दोपहर लंच करके अपनी सीट पर पहुँचा ही था कि एक सहकर्मी ने बताया कि "गुरप्रीत! तेरे लिए एक पार्सल आया है।".....एकबारगी हैरत सी हुई कि आधा दिन बीत चुका है और यहाँ घर से दूर महाराष्ट्र में किसने मेरे ऑफिस में कुछ मेरे लिए भेजा होगा।
ख़ैर, पता किया तो एक डेढ़- दो फीट लम्बा कार्ड जैसा कोई पार्सल देख कर हैरानी सी हुई।....... ऊपर नाम और पता लिखा था एक फेसबुक मित्र का। लिफ़ाफ़ा खोलने से अंदाज़ा सही निकला। एक डेढ़ -दो फीट लम्बा चौड़ा बर्थडे कार्ड ही था। लेकिन जिस शिद्दत और मुहब्बत से इसे सजाया गया था मेरी आँखों में आँसू आये बिना नहीं रह सके।....... एक बाज़ारी कार्ड को कस्टमाइज़ करके मेरी फेसबुक प्रोफाइल से ढेर सारी बचपन और अब की तस्वीरों को प्रिंट करवा कर कार्ड में इस सलीके से चिपकाया गया था कि क्या बताऊँ। हर एक पृष्ठ पर तस्वीर के साथ ढेर सारी ममता उड़ेल रखी थी।.......ये क्रांति कीर्ती जी हैं जो मन ही मन मुझे अपना बेटा मान चुकी हैं ......जिन्होंने ऐसा किया। और एक पेज पर तो मेरी बचपन की तस्वीर के साथ खुद की तस्वीर को इस एडिटिंग के साथ लगाया कि एकदम ऐसा लग रहा था कि मैं इनकी गोद में ही हूँ।
.......सोच रहा हूँ कभी कभी फेसबुक के रिश्ते भी कितने सहज और पवित्र हो जाते हैं।खुशकिस्मत हूँ कि यूँ ही कभी कभी कितना ज्यादा प्यार मिलता है मुझे। .......ख़ैर, इतना सारा पवित्र प्यार पा कर मैं तो भावविभोर था ही। ऑफिस के लोगों ने उल्टपलट कर कार्ड यूँ देखा पढा जैसे कोई अजूबा हो।..... सबके मुँह पर एक ही सवाल था कि किसने भेजा है इतना खूबसूरत कार्ड।
जवाब भी मेरा उतना ही सहज था-
" मेरी माँ ने और किसने"
ख़ैर, पता किया तो एक डेढ़- दो फीट लम्बा कार्ड जैसा कोई पार्सल देख कर हैरानी सी हुई।....... ऊपर नाम और पता लिखा था एक फेसबुक मित्र का। लिफ़ाफ़ा खोलने से अंदाज़ा सही निकला। एक डेढ़ -दो फीट लम्बा चौड़ा बर्थडे कार्ड ही था। लेकिन जिस शिद्दत और मुहब्बत से इसे सजाया गया था मेरी आँखों में आँसू आये बिना नहीं रह सके।....... एक बाज़ारी कार्ड को कस्टमाइज़ करके मेरी फेसबुक प्रोफाइल से ढेर सारी बचपन और अब की तस्वीरों को प्रिंट करवा कर कार्ड में इस सलीके से चिपकाया गया था कि क्या बताऊँ। हर एक पृष्ठ पर तस्वीर के साथ ढेर सारी ममता उड़ेल रखी थी।.......ये क्रांति कीर्ती जी हैं जो मन ही मन मुझे अपना बेटा मान चुकी हैं ......जिन्होंने ऐसा किया। और एक पेज पर तो मेरी बचपन की तस्वीर के साथ खुद की तस्वीर को इस एडिटिंग के साथ लगाया कि एकदम ऐसा लग रहा था कि मैं इनकी गोद में ही हूँ।
.......सोच रहा हूँ कभी कभी फेसबुक के रिश्ते भी कितने सहज और पवित्र हो जाते हैं।खुशकिस्मत हूँ कि यूँ ही कभी कभी कितना ज्यादा प्यार मिलता है मुझे। .......ख़ैर, इतना सारा पवित्र प्यार पा कर मैं तो भावविभोर था ही। ऑफिस के लोगों ने उल्टपलट कर कार्ड यूँ देखा पढा जैसे कोई अजूबा हो।..... सबके मुँह पर एक ही सवाल था कि किसने भेजा है इतना खूबसूरत कार्ड।
जवाब भी मेरा उतना ही सहज था-
" मेरी माँ ने और किसने"







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