पागल दौड़
सहजता का आसमा है, असहज शहर की आबोहवा .....निष्ठुर अनजान चेहरे हैं और दूर दूर तक मौत सी नींद में लिपटे लोग।....मौत इसलिए क्यूँकि रात में मरना होता है और दिन में जीना।.....रात का आख़िरी पहर है, खिड़की पर हूँ और आँखों में एक क़तरा नींद नहीं।......गलियों में अब वीरानता ही चौकीदार बन बैठी है........ज़िन्दगी ऐसी ही तो है, थोड़ी थोड़ी हर पल ख़त्म होती सी। चार आना कमाने और आठ आना खर्च होने जैसी।.....पंजाबी के शायर शिव कुमार बटालवी ने भी तो कहा था एक बार, हम जैसे बेचैन और संवेदनशील लोगों के लिए, .......कि हम रोज़ थोड़ा थोड़ा मरते जाते हैं। हम ख़ुश नहीं अपनी ज़िन्दगियों में। क्योंकि हमने ज़िन्दगी के मर्म को पढ़ लिया है, जान समझ लिया है, .....संजय मिश्रा की आला फ़िल्म ‘आँखों देखी’ जैसा कुछ कुछ।.....वो सत्य जिसे हम अंटी में लिए घूमते हैं।.....क्या पागल दौड़ है, किधर जाना है, किसी को कोई ख़बर नहीं....बस दिन होते ही सब दौड़ने लगेंगे।......और हम चिंतक लोग .....हम चाहे कितना भी मुस्कुरा दें उत्सव मना लें, दुनियावी रस्मों रिवाजों से इतर हम सिर्फ़ मौत का इंतज़ार करते हैं।........इसे सेडिस्टिक कहो या उन्...