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घड़ी की आँखमिचोली

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 साल 2016-17 के दिन थे जब हाथ की घड़ी बार बार रुक रही थी। उन दिनों मेरी क़लम काग़ज़ पर सिर्फ़ दर्द लिख लिख बरस रही थी। कुछ ना लिखने की कोशिश में भी बहुत कुछ लिखा जाता था। बेइतबारी का आलम ये था कि मैं रुकी हुई घड़ी ही देखना चाहता था। घड़ी कभी ना कभी अपने कर्तव्य से विमुख हो जाती और मैं उस दुर्लभ क्षण को पकड़ ही ना पाता। अंतर्मन की व्यथा थी या क्या कि एक शाम ऑफ़िस से आ कर नवीं मुंबई में ही एक डॉक्टर के पास चला गया और उसने झटपट मुझे एक इंजेक्शन लगा दिया। पैसे दे कर जाने लगा तो शायद मेरी समझ का सदक़ा उसने मुझे यूँ ही अपने पास बैठा लिया और पूछने लगा कि क्या आप कोई ‘क्रीएटिव वर्क’ भी करते हैं? .....मेरे टालने के बावजूद वो सज्जन पूछने पर उतारू थे। ख़ैर मैं मान गया कि मुझे लिखने का शौक़ है, बस और कुछ नहीं। तो इस बात पर वो थोड़ा और ठीक सा बैठ कर मुझसे मेरे लेखन , डायरी , कविताओं के बारे में पूछने लगे। इतना सब मेरे लिए काफ़ी था , मैंने बताना शुरू किया कि आजकल सिर्फ़ gloomy stuff लिख रहा हूँ। चारों ओर उदासी नज़र आ रही है। अंदर से ख़ाली सा महसूस कर रहा हूँ लेकिन फिर भी इतनी ताक़त ज़रूर बची है ...