घड़ी की आँखमिचोली
अंतर्मन की व्यथा थी या क्या कि एक शाम ऑफ़िस से आ कर नवीं मुंबई में ही एक डॉक्टर के पास चला गया और उसने झटपट मुझे एक इंजेक्शन लगा दिया। पैसे दे कर जाने लगा तो शायद मेरी समझ का सदक़ा उसने मुझे यूँ ही अपने पास बैठा लिया और पूछने लगा कि क्या आप कोई ‘क्रीएटिव वर्क’ भी करते हैं? .....मेरे टालने के बावजूद वो सज्जन पूछने पर उतारू थे। ख़ैर मैं मान गया कि मुझे लिखने का शौक़ है, बस और कुछ नहीं। तो इस बात पर वो थोड़ा और ठीक सा बैठ कर मुझसे मेरे लेखन , डायरी , कविताओं के बारे में पूछने लगे। इतना सब मेरे लिए काफ़ी था , मैंने बताना शुरू किया कि आजकल सिर्फ़ gloomy stuff लिख रहा हूँ। चारों ओर उदासी नज़र आ रही है। अंदर से ख़ाली सा महसूस कर रहा हूँ लेकिन फिर भी इतनी ताक़त ज़रूर बची है कि एक तीन चार सौ पन्नों का दर्दनाक उपन्यास लिख दूँ। शाम को ऑफ़िस से छूटते ही मन करता है कि बीते हुए दिन को तक़दीर के हलक से खींच लूँ। ढलती शाम में बोझिल हुए आसमा का मुँह नोच लूँ। एक पल लगता है, सारी आवाज़ों को अनसुना कर अपने अंदर उतर जाऊँ, लेकिन अगले ही पल पानी में डूबते ,हाथ पैर मारते ,किसी घबराए इंसान के मानिंद ऊपर आ कर लम्बी साँस खींच बैठ जाता हूँ। .....फिर लिखता हूँ , स्केच बनाता हूँ और सो जाता हूँ। सुबह उठ कर अपने लिखे पर हैरान होता हूँ।
डॉक्टर ने मेरे हाथ पर बंधी घड़ी की ओर इशारा करके कहा, “घड़ी पहनने का भी शौक़ मालूम होता है आपको। ठीक समय बताती है?”
सुनते ही मैं चौंक सा गया था कि इन्हें कैसे मालूम घड़ी का मर्ज़। बहुत पूछने पर बस इतना ही बताया कि “घड़ी भी हमारी फ़ितरत को भाँप लेती है।”
बाद में किसी किताब से पढ़ कर मालूम चला कि उन दिनों की लिखी कविताओं का ही असर था कि घड़ी बार बार कुछ मिनट पीछे हो जाती थी या यूँ कहूँ कि 24 घंटे में कभी ना कभी दिल से धड़कन आँखमिचोली खेल जाती थी।
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