उदासियों के पैरहन, परेशानियों के मौसम
दिन अकेला नहीं खलता, रात उदास हो या अकेली,बहुत खलती है। एक अदृश्य यात्रा है ज़िंदगी, जिसमें चले जा रहे हैं। कभी कभी लगता है इतनी धूप है कि सर जल जाए और कभी कभी लगता है कि इतना अँधेरा है कि एक पाँव भी आगे नहीं रखा जाता और साँस फूल जाएगी। घुप अँधकार, परेशानियाँ, उदासी, नकारापन, इतना शोर कि नींद फ़ाख्ता हो जाती है। भावों से भरी गगरी अंतस् से आँखों में छलकने को हो आती है। तब लगता है कि कोई तो हो जो हाथ थाम कर एक बार कह दे कि “फ़िक्र ना करो, मैं हूँ तुम्हारे साथ…. हमेशा के लिए।” लेकिन लगता है कि ये अल्फ़ाज़ अगर कोई कह भी दे तो आँखें बरस जायेंगी। बहुत सारे कन्फ़ेशंस बहुत सारे बाँध एक झटके में टूट जाएँगे। ज़िंदगी मुस्कुराने की बजाय चीख चीख कर रो उठेगी। किसी ने कहा था कि ज़िंदगी सुंदर या आसान होती नहीं, बनानी पड़ती है। सही है, हमारे लिए हुए कुछ फ़ैसले ही हमें कभी सोने नहीं देते। जागते, सोते, उठते, बैठते, रोते, हँसते, बात करते या मौन हर समय एक टीस की माफ़िक़ हमारी छाती में लोटते हैं। हम चाहते हैं कि किसी के सामने अपनी ग़लतियों को कॉन्फ़ेस करें लेकिन सीने में वही ग़ुबार ताउम्र ढोते हैं।...