उदासियों के पैरहन, परेशानियों के मौसम
दिन अकेला नहीं खलता, रात उदास हो या अकेली,बहुत खलती है। एक अदृश्य यात्रा है ज़िंदगी, जिसमें चले जा रहे हैं। कभी कभी लगता है इतनी धूप है कि सर जल जाए और कभी कभी लगता है कि इतना अँधेरा है कि एक पाँव भी आगे नहीं रखा जाता और साँस फूल जाएगी।
घुप अँधकार, परेशानियाँ, उदासी, नकारापन, इतना शोर कि नींद फ़ाख्ता हो जाती है। भावों से भरी गगरी अंतस् से आँखों में छलकने को हो आती है। तब लगता है कि कोई तो हो जो हाथ थाम कर एक बार कह दे कि “फ़िक्र ना करो, मैं हूँ तुम्हारे साथ…. हमेशा के लिए।” लेकिन लगता है कि ये अल्फ़ाज़ अगर कोई कह भी दे तो आँखें बरस जायेंगी। बहुत सारे कन्फ़ेशंस बहुत सारे बाँध एक झटके में टूट जाएँगे। ज़िंदगी मुस्कुराने की बजाय चीख चीख कर रो उठेगी।
किसी ने कहा था कि ज़िंदगी सुंदर या आसान होती नहीं, बनानी पड़ती है। सही है, हमारे लिए हुए कुछ फ़ैसले ही हमें कभी सोने नहीं देते। जागते, सोते, उठते, बैठते, रोते, हँसते, बात करते या मौन हर समय एक टीस की माफ़िक़ हमारी छाती में लोटते हैं। हम चाहते हैं कि किसी के सामने अपनी ग़लतियों को कॉन्फ़ेस करें लेकिन सीने में वही ग़ुबार ताउम्र ढोते हैं।
बुद्ध कहते हैं ये संसार दुःखों का घर है और सुख की अपेक्षा ही दुःख का मूल कारण है। सुख दुःख शरीर के साथ चलते हैं। हम चाह कर भी नार्मल नहीं हो पाते क्यूँकि नार्मल या सहज होना दुनिया में रहने के लिए पर्याप्त नहीं है। मैंने जब से आँख खोली है इस दुनिया को भावविह्वल अवस्था में ही देखा, जाना और महसूस किया है। बचपन में स्कूल जाते रोना साधारण सा जान पड़ता है लेकिन वास्तविकता में साधारण है नहीं। प्रार्थना में आँखें मूँदे खड़े होने पर घबरा कर आँखें खोल बड़ी बहन को ढूँढना भी स्वाभाविक ही रहा होगा।
माता पिता को कभी भी अपने सपनों के पाँवों की बेड़ियाँ नहीं माना मैंने। लेकिन उनसे दूर रह कर एक एक शाम का रात में बदल जाना बिल्कुल भी स्वाभाविक नहीं जान पड़ता। (क्यूँकि मेरी ज़िंदगी की पहली सबसे ख़ूबसूरत ख़ुशी वही हैं।) माना कि कर्ता हम हैं लेकिन ख़ुद को इस दोष के साथ ताउम्र ढोना बहुत नागवार सा गुज़रता है। मैं इस अँधेरे में जब भी ख़ुद को घिरा पाता हूँ, बहुत ज़्यादा अकेला और उदास हो जाता हूँ।
ज़िंदगी दिन से ज़्यादा रात में ही रुलाती है। क्यूँकि रात की वीरानगी अंदर की पीड़ा को और बढ़ाती है। एक एक साँस फ़ालतू सी जान पड़ती है। बक़ौल मृदुला गर्ग “अँधेरा अपना निजी होता है, बाहर चाहे कितनी भी रोशनी क्यों ना हो।” और फिर लगता है यहाँ हैं तो क्यूँ हैं। जहाँ से चले थे वहाँ फिर कब होंगे। जो कर रहे हैं उसमें खुश क्यों नहीं , क्यूँ अटके पड़े हैं इस चक्रव्यूह में।इस से बाहर कब निकलेंगे। कैसे निकलेंगे। कहाँ जाना है, जहाँ जाना है वहाँ जाना ही क्यूँ है।
~ DrGurpreet Singh
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