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Showing posts from October, 2019

दिल्ली प्रदूषण

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पटाखों वाली दीवाली चली गयी और इन दिनों फिर से दिल्ली वायु प्रदूषण बहुत ख़बरों में है ....वैसे ये कोई नयी बात नहीं....दिसम्बर २०१७ में भारत श्रीलंका के बीच मास्क पहन के खेला जाने वाला टेस्ट मैच तो याद ही होगा आपको।....अब फिर से लोग Smog हैश्टैग लगा कर राजधानी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पेल रहे हैं.....पता सबको होगा ही कि स्मॉग प्रदूषित हवा का वो मिश्रण है जो धूएँ और कोहरे के मिलने से बनता है इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि ये समस्या उत्तरी भारत में मिलती है....ख़ासकरके उन गाँवों के क़रीब बसे शहरों में जहाँ खेतों में पूली/पराली जला दी जाती है। इस से ना केवल ज़मीन की उपजाऊ क्षमता को नुक़सान पहुँचता है बल्कि वातावरण में स्मॉग भरपूर मात्रा में बनता है जिससे वातावरण प्रदूषित होने के साथ साथ समीपीय सड़क और राजमार्गों के यातायात को दृष्टिबाधा भी पहुँचती है.........मेरा ख़्याल है हम सब लोग एक ऐसे हिप्पोक्रेट समाज का हिस्सा हैं जहाँ समय समय पर नदियों में मेले लगते हैं ...नदियों की पूजा के बहाने उन्हें प्रदूषित भी भरपूर मात्रा में किया जाता है .... संसद में असंसदीय भाषा का इस्तेमाल होता है २-४ कुर्सिय...

बचन का बिन्नी

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कुछ कहानियाँ लिखता कोई और है लेकिन जीते हम ख़ुद हैं ....बचपन से मेरे साथ यह संयोग अक्सर होता रहा है। इसे अपनी अवलोकन क्षमता कह कर वाहवाही लूटूँ या कि अपना पागलपन कहूँ , किताब हिंदी की होती या अंग्रेज़ी की मैं उसके अध्यायों के किरदारों में खो जाता।उसी दौर में स्कूल की हिंदी की किताब में मोहन राकेश की एक कहानी पढ़ी थी -“आर्द्रा”..... कहानी अंदर तक इतनी ज़्यादा छप गयी थी कि मुझे इसके एक एक शब्द से मेरा जन्मों का वास्ता लगता था। मैं चाहे बालमन से बड़ा हो गया हूँ लेकिन आज भी मेरे अंतस के आँगन की मिट्टी में इस कहानी के किरदारों के संवाद और संवेदनाएँ इस क़द्र मौजूद हैं जैसे मेरा मन इस कहानी का अपना ही घर हो। पिछले सोमवार माँ को लेने दादर(बम्बई) स्टेशन गया तो ये कहानी मेरे अंदर शुरू हो गयी और पिछले आठ दिन माँ के साथ बम्बई में ये कहानी मेरे साथ साथ चली .....आज सुबह बम्बई एयरपोर्ट पर माँ को विदा करते हुए कहानी का सारा कथानक मानों चक्करघिन्नी सा दिल की दीवारों से टकरा अहसासों की मुँडेरें फाँद गया। ‘’आर्द्रा’’ एक माँ की कहानी है। उस माँ -‘बचन’ की कहानी ,जिसके दो बेटे हैं ,छोटा बेटा ‘बिन्नी’ ज...

कैटरपिलर/ बम्बई डायरी/ 10-09-2016

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चुना भट्टी स्टेशन पर रूकती लोकल उसके ज़ेहन में एक हरकत पैदा कर गयी .... वैसे उसे बम्बई की लोकल में कुछ दिलचस्प नहीं लगा था सिवाय एक बात के , कि यह एक स्टेशन पर 10-15 सेकंड से ज्यादा नहीं रुकती।........ दिल्ली की मैट्रो जैसा ऐ.सी. भी नहीं है इसमें ......सिर्फ बेदम से पंखे हैं .... हालाँकि दिल्ली की मेट्रो में भी बेतहाशा भीड़ होती है .....लेकिन बम्बई की लोकल जैसी दरवाजों से बाहर लटकने की छूट नहीं होती ..........बम्बई की 'लोकल' मानो यहाँ की व्यस्त ,क्रूर ज़िंदगी की प्रतिनिधि बन आपका स्वागत करती है ........जैसे मरीन ड्राइव इस शहर में कुछ पल का दिया हुआ मीठा सा भुलावा है ...... जहाँ बैठ कर अपने आप से बतियाना उसे अच्छा लगता है ....उसके कहे लफ़्ज़ बार बार समन्दर की लहर ले जा कर दूर छोड़ आती है .....वहाँ ,जहाँ सबकी परेशानियाँ ,सबके लफ़्ज़ सम्भाले पड़े हैं .... अलाहिदा -अलाहिदा बैंक अकाउंट्स की तरह। लोकल की खिड़की से चुना भट्टी के प्लेटफॉर्म पर उसकी निगाहें एक महीन सी हरकत करती आकृति पर टिक गई ....क्या है ये ???....हल्के हरे से रंग का ......रेंग रहा है ....इतनी व्यस्त सी जगह में...

महात्मा का दिन - अहिंसा दिवस

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जन्मदिन मुबारक हो तुम्हें महात्मा....स्कूली दिनों की बात करूँ तो हर रोज़ प्रार्थना प्राँगण में लगे ब्लैक बोर्ड पर सफेद चॉक से समाचार लिखने की ज़िम्मेदारी निभाते निभाते रोज़ सबसे ऊपर की पंक्ति में एक अनमोल वचन लिखने की भी परंपरा थी.....इस परंपरा को निभाते निभाते कब महात्मा से प्यार हो गया , नहीं जानता।.....बाल मन में तब कई सवाल भी उठा करते थे कि ये महात्मा कैसा था?.....देश को आज़ाद करवाया तो इतनी जल्दी क्यूँ चला गया? ...... आज़ादी की मुहिम का सूत्रधार था तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति क्यों नहीं बना?.....भगत सिंह की हिमायत क्यों नहीं की? .....बाकी सब नेता थे ये महात्मा क्यूँ था?.....और भी कई सवाल चक्करघिन्नी बन मन की दीवारों से टकराते रहते। प्रार्थना समाप्त होने तक ब्लैकबोर्ड पर अनमोल वचन और समाचार सुलेख में लिख देता ....मेरा साथी देवेंद्र बीच बीच में मुझे चॉक, डसटर या स्केल पकड़ाता रहता। हर साल 2 अक्टूबर पर बाल सभा होती और...... 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल' सरीखे गीतों में बीतती।.....मैं कभी महात्मा गाँधी पर निबंध पढ़ता कभी कोई किस्सा या कविता।..... यह सब एक रस्म की तरह ...