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Showing posts from January, 2021

गोबिंद - जनमानस की आवाज़

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गोबिंद एक मज़हब विशेष के इतिहास का महज़ एक किरदार नहीं। ना ही पुजारी द्वारा स्थापित कोई धार्मिक महानायक ही है। गोबिंद उस एक विचारधारा का नाम है जो ज़ालिम सत्ता की आँख में आँख डाल कर उसका ग़ुरूर भी तोड़ सकती है और वक़्त आने पर अपने पुत्रों की बलि भी दे सकती है। गोबिंद अपने पिता की बलि पर भी उत्साहित है और आमजन के अधिकारों की ख़ातिर ताली बजा कर आनंदपुर का क़िला छोड़ते हुए अपने रण कौशल और पाक इरादों का परिचय भी देता है। गोबिंद उस सच्चाई का नाम है, जो झूठ के अँधियारे को चीरती हुई इतिहास के सफ़हों पर दर्ज है। गोबिंद हर उस आम इंसान की आवाज़ है जो मारी जा सकती है लेकिन दबाई नहीं जा सकती।  प्यारा गोबिंद ख़ुद को भगवान इसीलिए ही नहीं कहता क्यूँकि वो हर उस आम इंसान की परछाई है जो सच के रास्ते पर चलता है, जिसे बस इंसानियत में छिपी सच्ची नीयत सीख कर ज़िंदगी जीनी है। यही बात उसे विरला और सम्पूर्ण बनाती है। DrGurpreet Singh  #गुरु_गोबिंद #जन्मदिन_विशेष    

सतवंत सिंह - एक विचारधारा का कलंक

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  सतवंत सिंह, इंदिरा गांधी का हत्यारा। जिसकी एक भारी ग़लती का कलंक अब तक सिख समाज अपने ऊपर से उतार नहीं पाया है। एक सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होती। हिंसा कभी भी जस्टिफ़ाई नहीं की जा सकती। मैं आज भी इंदिरा गांधी या महात्मा गांधी की हत्या का वाक़या सुनता हूँ तो सीना तार तार हो जाता है। बाईस साल का एक सवा छः फ़ुट का अच्छी क़द काठी का नौजवान जिसके सामने सारी ज़िंदगी पड़ी थी जीने को, फूहड़ धार्मिक आक्रोश के चलते ब्रेनवाश हुआ और देश की क़द्दावर प्रधानमंत्री के क़त्ल जितना घिनौना काम कर बैठा।अपनी क़ाबिलियत के चलते पहले दिल्ली पुलिस और फिर बिना किसी चयन प्रक्रिया के सीधा ही प्रधानमंत्री के एक सौ बीस अंगरक्षकों में चयनित होना निसंदेह बड़ी बात रही होगी। ‘प्रियदर्शनी’ के निवास स्थान पर अंगरक्षक की नियुक्ति पाने के साथ ही कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी थी जो सतवंत सिंह निभा सकता था। लेकिन 31 अक्तूबर 1984 की सुबह जो हुआ उसके परिणाम दिल्ली और देशभर के सिखों ने भुगते। एक ‘ब्रेनवाशड नौजवान’ की काली करतूत की सज़ा लाखों सिखों ने उठाई।  दंगे दुतरफ़ा होते हैं  लेकिन वो ‘दंगे’ नहीं थे। अवसर...