सतवंत सिंह - एक विचारधारा का कलंक
सतवंत सिंह, इंदिरा गांधी का हत्यारा। जिसकी एक भारी ग़लती का कलंक अब तक सिख समाज अपने ऊपर से उतार नहीं पाया है। एक सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होती। हिंसा कभी भी जस्टिफ़ाई नहीं की जा सकती। मैं आज भी इंदिरा गांधी या महात्मा गांधी की हत्या का वाक़या सुनता हूँ तो सीना तार तार हो जाता है।
बाईस साल का एक सवा छः फ़ुट का अच्छी क़द काठी का नौजवान जिसके सामने सारी ज़िंदगी पड़ी थी जीने को, फूहड़ धार्मिक आक्रोश के चलते ब्रेनवाश हुआ और देश की क़द्दावर प्रधानमंत्री के क़त्ल जितना घिनौना काम कर बैठा।अपनी क़ाबिलियत के चलते पहले दिल्ली पुलिस और फिर बिना किसी चयन प्रक्रिया के सीधा ही प्रधानमंत्री के एक सौ बीस अंगरक्षकों में चयनित होना निसंदेह बड़ी बात रही होगी।
‘प्रियदर्शनी’ के निवास स्थान पर अंगरक्षक की नियुक्ति पाने के साथ ही कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी थी जो सतवंत सिंह निभा सकता था। लेकिन 31 अक्तूबर 1984 की सुबह जो हुआ उसके परिणाम दिल्ली और देशभर के सिखों ने भुगते। एक ‘ब्रेनवाशड नौजवान’ की काली करतूत की सज़ा लाखों सिखों ने उठाई।
दंगे दुतरफ़ा होते हैं लेकिन वो ‘दंगे’ नहीं थे। अवसरवारी अलगाववादियों ने बेगुनाह लोगों पर साम्प्रदायिक हिंसा बरपा दी। मानो हिंसा कई गुना हिंसा का विकराल रूप धर वापिस सिखों पर बरपी।
इंदिरा गांधी हो या महात्मा गांधी , क़ातिल ब्रेनवाशड साम्प्रदायिक विचारधारा ही थी।
धर्म और धार्मिक ग्रंथ अगर हिंसा सिखाते हैं तो किसी काम के नहीं।
आज ही के दिन 6 जनवरी 1989 को फाँसी की सज़ा भले ही मिल गई हो उसे लेकिन लानत है उन सब पर, जो जो पुजारी वर्ग के ऐसे बहकावे में आ कर धर्म युद्ध नामक हिंसा की राह पर चले।
#Indira_Gandhi_Assasination
DrGurpreet Singh/ Bombay-Diary


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