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Showing posts from December, 2022

पायलट रेना- असीम गगन की उन्मुक्त परी

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मेरी बड़ी भतीजी रेना 15 साल की उम्र में हवाईजहाज़ उड़ाना सीख रही है। हमारे रखरा ख़ानदान की शान। ❤️बहुत गर्व है इन बच्चों पर। आज इनकी बदौलत हम जहाज़ में सफ़र करने से जहाज़ उड़ाने वाले भी हो गये। आज चौथी बार अटलांटिक महासागर पायलट भतीजी रैना के साथ उड़ कर देखा। अकथनीय नज़ारा, शब्द कम पड़ जाएँ और आँखों के कैमरे ने फ़ोन के कैमरे से सुंदर स्मृतियाँ सहेज कर रख ली। खूब जीयो रेना। रब की मेहर और सुख रहे। 🙏🏻 -30.12.2022/ अमेरिका डायरी/ डॉ.गुरप्रीत सिंह #flying #atlanticocean #neiceandnephew #prouduncle #proudmoment #familytime #photography #oceanphotography #horizon #goodbye2022 #oceanview

ठंडी मौत

आजकल   मुझे   लगने   लगा   है   मेरे   अंदर   का   सारा   प्रेम   जैसे   सूख   गया   हो   और   मैं   किसी   सूखे   चश्मे   के   निशाँ   सा   पहाड़   की   सिल पर   अपने   प्रेम   का   वजूद   खोता   जा   रहा   हूँ।   लेकिन   मुझे   साथ   ही   यह   भी   लगता   है   कि   यह   निशाँ   कालांतर   में   अपूर्ण   प्रेम   का जीवाश्म   ज़रूर   बनेगा।किसी   सूखी   चमड़ी   के   निशाँ   सा   जिसकी   चोट   पहले   काफ़ी   समय   तक   लहू   लुहान   रिसती   रही   और फिर   उसमें   यादों   की   मवाद   इस   क़दर   भरती   गई   कि   एक   समय   के   बाद   वो   हर   धड़कन   हर   स्पंदन   से ...

मैंटल आधुनिकीकरण

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  बम्बई में काफ़ी समय व्यतीत करने के बाद अब दिल्ली या उत्तरी भारत की व्यवस्था पर हैरानी भी होती है और खीज भी आती है। बम्बई में बहुत सी चीजें इतनी सहजता  और सुगमता से उपलब्ध हैं कि उनके होने पर कभी शुकराना या gratitude महसूस करने की ज़हमत नहीं उठाई। दिल्ली सिर्फ़ शहर नहीं, दिल्ली इसकी भौगोलिक सरहदों तक है। जब भी दिल्ली के विकास की बात आती है वो सिर्फ़ समयपुर बादली से हुडासिटी सेंटर या वैशाली से नॉएडा बॉर्डर तक की बात करते हैं। कभी करनाल बायपास पर खड़े हो चारों ओर नज़र घुमा कर देखो, क्नाट प्लेस वाले सफ़ेद गलियारे ज़ेहन से उड़न छू हो जाएँगे। कभी बदरपुर बॉर्डर की कच्ची बस्तियाँ देखो, अकबर रोड की ठंडी हवा की मिसाल देनी भूल जाओगे। दिक़्क़त ये है कि विकास सिर्फ़ वहीं तक आ रहा जहाँ तक मेट्रो आ रही। विकास कब से मेट्रो का मोहताज़ होने लगा। जब भी दिल्ली आता हूँ दिल्ली के चेहरे में से बेरोज़गारी वाली दिल्ली को उघाड़ने की कोशिश करता हूँ। लगता है कोई कोई कोना बिल्कुल वैसा है जैसा छोड़ा था। बिल्कुल हमारे अंतर्मन के उन अंधेरे कोनों जैसा जायज़ नाजायज़ के बीच की परिभाषा को तलाशता। हम लाख भाग ले...