ठंडी मौत

आजकल मुझे लगने लगा है मेरे अंदर का सारा प्रेम जैसे सूख गया हो और मैं किसी सूखे चश्मे के निशाँ सा पहाड़ की सिलपर अपने प्रेम का वजूद खोता जा रहा हूँ। लेकिन मुझे साथ ही यह भी लगता है कि यह निशाँ कालांतर में अपूर्ण प्रेम काजीवाश्म ज़रूर बनेगा।किसी सूखी चमड़ी के निशाँ सा जिसकी चोट पहले काफ़ी समय तक लहू लुहान रिसती रही औरफिर उसमें यादों की मवाद इस क़दर भरती गई कि एक समय के बाद वो हर धड़कन हर स्पंदन से मुक्त हो निष्प्राण होसूख गई।ऑफ़िस से लौटते हुए सड़क पर चलते चलते अचानक मुझे लगता है कि मेरा शरीर हाड़ माँस का ज़रूर है लेकिनजैसे रक्त सूख गया हो और मेरी रुधिर वाहिनियों में सिर्फ़ रंगहीन गंधहीन हवा सी भरी हो।मुझे ये भी लगता है कि कोईदुनियावी स्पर्श मुझे अब हैरा नहीं कर सकता।भूख प्यास भी जैसे एक हद से बढ़कर शून्य हो जाए।ट्रैफ़िक सिग्नल , हॉर्नअसंख्य गाड़ियाँअसंख्य स्टीरिंगउन पर अनेकों हाथअसंख्य अंगुलियाँअसंख्य जिंदगीयाँघर लौटने की जल्दी मेंभागते असंख्य लोग। इतनी कृत्रिमता कि सब कुछ शून्य की गर्त में जाता दिखता है। आजकल जब मैं ख़ुद से ज़्यादा बातकरता हूँ तो फिर किसी सवाल की कोई जवाबदेही नहीं रह जातीगिद्ध नज़रों से बचते बचते बेख़बर सा हो जाता हो जैसेमन। चलते चलते भी जैसे जड़वत -बेख़बर सा होता जाए इंसान।शायद इसे ही ठंडी मौत मरना कहते हों। है ना?

-डॉ.गुरप्रीत/मुंबई

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