बम्बई में काफ़ी समय व्यतीत करने के बाद अब दिल्ली या उत्तरी भारत की व्यवस्था पर हैरानी भी होती है और खीज भी आती है। बम्बई में बहुत सी चीजें इतनी सहजता और सुगमता से उपलब्ध हैं कि उनके होने पर कभी शुकराना या gratitude महसूस करने की ज़हमत नहीं उठाई। दिल्ली सिर्फ़ शहर नहीं, दिल्ली इसकी भौगोलिक सरहदों तक है। जब भी दिल्ली के विकास की बात आती है वो सिर्फ़ समयपुर बादली से हुडासिटी सेंटर या वैशाली से नॉएडा बॉर्डर तक की बात करते हैं। कभी करनाल बायपास पर खड़े हो चारों ओर नज़र घुमा कर देखो, क्नाट प्लेस वाले सफ़ेद गलियारे ज़ेहन से उड़न छू हो जाएँगे। कभी बदरपुर बॉर्डर की कच्ची बस्तियाँ देखो, अकबर रोड की ठंडी हवा की मिसाल देनी भूल जाओगे। दिक़्क़त ये है कि विकास सिर्फ़ वहीं तक आ रहा जहाँ तक मेट्रो आ रही। विकास कब से मेट्रो का मोहताज़ होने लगा। जब भी दिल्ली आता हूँ दिल्ली के चेहरे में से बेरोज़गारी वाली दिल्ली को उघाड़ने की कोशिश करता हूँ। लगता है कोई कोई कोना बिल्कुल वैसा है जैसा छोड़ा था। बिल्कुल हमारे अंतर्मन के उन अंधेरे कोनों जैसा जायज़ नाजायज़ के बीच की परिभाषा को तलाशता। हम लाख भाग ले...
ठाणे से जिस लोकल में वो चढ़ा था ... एक तो रात के कोई 9 बज रहे थे .... ऊपर से पहला दर्जा होने के कारण भीड़ भी नहीं थी।.... मुलुंड स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन रुकी ...एक 9-10 साल की मासूम सी लड़की अपने छोटे छोटे हाथों में कुछ ड्रॉइंग बुक्स ले कर चढ़ी।.... सांवले गेहुएँ रंग पर तंग हरा सलवार सूट, गुलाबी दुपट्टा, हाथों में प्लास्टिक की चूड़ियाँ और माथे पर चमकीली बिंदी उसे कुछ समझदार व्यक्तित्व दे रहे थे । पैरों में सुंदर वेशभूषा के अनुरूप ही चमकदार जूतियाँ। जैसे परीलोक से कोई छोटी सी परी अपना सब कुछ छोड़ बम्बई की इस लोकल ट्रेन में ड्रॉइंग बुक्स बेचने उतर आई हो।.....पचास की तीन!!, ....सौ की छः!! ....... पचास की तीन!!,.... सौ की छः!!....पुकारते पुकारते ठीक उसके सामने बैठ गयी, ....उसे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई और बच्ची के चेहरे पर एक अजीब सी चमक।......."ले लो अंकल प्लीज़ ले लो! अंकल !!! प्लीज़ अंकल!! ले लो ना!!!!" ........उसके घुटने को अपने छोटे से हाथ से बार बार थपथपाते हुए , गर्दन टेढ़ी करके विनती के स्वर में वो कहती जा रही थी।....एक दो बार मुस्कुरा कर उसने मना किया.......
चुना भट्टी स्टेशन पर रूकती लोकल उसके ज़ेहन में एक हरकत पैदा कर गयी .... वैसे उसे बम्बई की लोकल में कुछ दिलचस्प नहीं लगा था सिवाय एक बात के , कि यह एक स्टेशन पर 10-15 सेकंड से ज्यादा नहीं रुकती।........ दिल्ली की मैट्रो जैसा ऐ.सी. भी नहीं है इसमें ......सिर्फ बेदम से पंखे हैं .... हालाँकि दिल्ली की मेट्रो में भी बेतहाशा भीड़ होती है .....लेकिन बम्बई की लोकल जैसी दरवाजों से बाहर लटकने की छूट नहीं होती ..........बम्बई की 'लोकल' मानो यहाँ की व्यस्त ,क्रूर ज़िंदगी की प्रतिनिधि बन आपका स्वागत करती है ........जैसे मरीन ड्राइव इस शहर में कुछ पल का दिया हुआ मीठा सा भुलावा है ...... जहाँ बैठ कर अपने आप से बतियाना उसे अच्छा लगता है ....उसके कहे लफ़्ज़ बार बार समन्दर की लहर ले जा कर दूर छोड़ आती है .....वहाँ ,जहाँ सबकी परेशानियाँ ,सबके लफ़्ज़ सम्भाले पड़े हैं .... अलाहिदा -अलाहिदा बैंक अकाउंट्स की तरह। लोकल की खिड़की से चुना भट्टी के प्लेटफॉर्म पर उसकी निगाहें एक महीन सी हरकत करती आकृति पर टिक गई ....क्या है ये ???....हल्के हरे से रंग का ......रेंग रहा है ....इतनी व्यस्त सी जगह में...
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