मैंटल आधुनिकीकरण
बम्बई में काफ़ी समय व्यतीत करने के बाद अब दिल्ली या उत्तरी भारत की व्यवस्था पर हैरानी भी होती है और खीज भी आती है। बम्बई में बहुत सी चीजें इतनी सहजता और सुगमता से उपलब्ध हैं कि उनके होने पर कभी शुकराना या gratitude महसूस करने की ज़हमत नहीं उठाई। दिल्ली सिर्फ़ शहर नहीं, दिल्ली इसकी भौगोलिक सरहदों तक है। जब भी दिल्ली के विकास की बात आती है वो सिर्फ़ समयपुर बादली से हुडासिटी सेंटर या वैशाली से नॉएडा बॉर्डर तक की बात करते हैं। कभी करनाल बायपास पर खड़े हो चारों ओर नज़र घुमा कर देखो, क्नाट प्लेस वाले सफ़ेद गलियारे ज़ेहन से उड़न छू हो जाएँगे। कभी बदरपुर बॉर्डर की कच्ची बस्तियाँ देखो, अकबर रोड की ठंडी हवा की मिसाल देनी भूल जाओगे। दिक़्क़त ये है कि विकास सिर्फ़ वहीं तक आ रहा जहाँ तक मेट्रो आ रही। विकास कब से मेट्रो का मोहताज़ होने लगा। जब भी दिल्ली आता हूँ दिल्ली के चेहरे में से बेरोज़गारी वाली दिल्ली को उघाड़ने की कोशिश करता हूँ। लगता है कोई कोई कोना बिल्कुल वैसा है जैसा छोड़ा था। बिल्कुल हमारे अंतर्मन के उन अंधेरे कोनों जैसा जायज़ नाजायज़ के बीच की परिभाषा को तलाशता। हम लाख भाग ले...



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