‘कबीर सिंह’फ़िल्म समीक्षा -

 अपने अपने आदर्शवाद -

परसों परेल (बम्बई) में शाहिद कपूर अभिनीत फिल्म 'कबीर सिंह' देख कर आया .... शाहिद ने पिछले कुछ सालों में खुद को एक अलग अभिनेता के रूप में खोजा है। अब वो रोमांटिक फिल्मों में चॉकलेटी अभिनेता की जगह , एक्शन, थ्रिलर और अपराध सरीखी फिल्मों में काम करने वाला सुदृढ़ , सशक्त एंग्री यंग मैन नायक है। 'हैदर', 'उड़ता पंजाब' और 'पद्मावत' इसके कुछ उदाहरण भर हैं।....खैर 'कबीर सिंह' एक विशुद्ध प्रेम कहानी तो है ही, साथ ही प्रेमी युगलों की सामाजिक उपेक्षा और त्रस्तता का चित्रीकरण भी है। माना कि आदर्श फ़िल्मकारी में नायक की छवि साफ सुथरी रखी जाती रही है , उसको ऐब मुक्त दिखाया जाता है , घर और समाज दोनों ओर वो पूज्नीय होता है .....ऐसा नायक सारी फ़िल्म में खलनायक से लड़ता है और अंत में ज़िंदगी और प्रेम दोनों जीत जाता है।........'कबीर सिंह' फ़िल्म का कबीर इतना उन्मादित गुस्से वाला नायक है कि उसे लगता है कि वो पेशे और नीयत से ईमानदार है और समाज को भी अपने गुस्से के बल पर ईमान का पाठ पढ़ाना चाहता है..... कहीं भी कोई अनियमितता देखता है ,तो बिफर पड़ता है। देश के जाने माने मेडिकल कॉलेज का टॉपर स्टूडेंट है। ..... इसी बीच वो प्रीति (किआरा आडवाणी) से टकराता है और उसकी दुनिया ही पलट जाती है।प्रीति जो पंजाबी परिवार से है और उसी के कॉलेज में दाखिला ले कर पढ़ने आई है।....कबीर और प्रीति एक दूसरे को देखते हैं और पूरे हो जाते हैं। कबीर प्रेम की ताकत को पहचानता है, समझता है और ज़िंदगी का सच जान जाता है। इसी बीच एक दिन समाज का छिछलापन 'आदर्शवाद' का विशेषण बन उन दोनों की राह काटता है या यों कहूँ कि दृढ़ता की परीक्षा लेता है , कबीर का गुस्सा ऐसी परिस्थिति को पार पाने के लिए तैयार नहीं होता,ऐसी परिस्थिति /हालात उसके लिए एकदम नया होता है, उसका उन्मादित गुस्सा ही उसे और प्रीति की ज़िन्दगियों में तूफान बन बरपता है।..... और फिर ऊपर से निर्देशक महोदय ने ऐसी हालत में नशे का सहारा लेते नायक के ज़रिए नशे का चिर परिचित महिमामंडन करने की कोई कसर नहीं छोड़ी...... कबीर तरह तरह के  नशे को अपना दोस्त बना लेता है, ....... कबीर के रूप में शाहिद ने अपने अभिनय से पूरी जान फूँक दी है .....कबीर एक ज़हीन डॉक्टर जरूर है ,लेकिन प्रतिभा और आवेग साथ साथ ज्यादा दिन नहीं काट पाते। फ़िल्म की कहानी का कथानक कहीं कहीं हकीकत के धरातल पर कमजोर जान पड़ता है......सिगरेट, शराब ,गांजा,  वीड, मॉर्फीन का आदी कबीर एकाएक कैसे यह सब छोड़ देता है समझ से बाहर की बात है ।.....और इस से भी जरूरी सवाल,भले ही फ़िल्म 'वयस्क' दर्ज़ा प्राप्त हो फिर भी नायक के रूप में क्या हम नशेड़ी, हिंसक, डरावने इंसान को देख कर खुश हैं , ताली पीट रहे हैं। या कि हम 'कबीर सिंह' सरीखी फिल्मों से कोई शिक्षा लेने की बजाय कोरा मनोरंजन ढूंढते हैं, और रातो रात बॉक्स ऑफिस हिट करवा कर ही मानते हैं।

~डॉ.गुरप्रीत /फ़िल्म समीक्षा / बम्बई डायरी    
                                                                                                                                           

Comments

बेहद खूब दोस्त.....दुनिया के पहलू और मापदंड पल पल बदलते हैं ये तय कर पाना हर किसी के लिए आसान नहीं है कि सही का स कितना सही है और गलत का ग कितना गलत
शुक्रिया दोस्त ... बहुत सुंदर लिखा तुमने ....

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