अंदर का तूफ़ान - अंतस की बेताबियाँ

कल ही की तो बात है , ऑफ़िस में एक जूनियर कर्मचारी मुझे गुडमॉर्निंग विश करके पास से गुज़र रहा था तो बोल उठा ....”सर आपको देख कर दिन बन जाता है ...” इस अप्रत्याशित टिप्पणी के जवाब में विस्मित सा मैं रुक गया। “क्यूँ भई ऐसा क्या हो गया “.... मेरे इस सवाल से थोड़ा  सकपका कर और आत्मीयता के स्वर में वो बोला ....”ऐसा कुछ नहीं सर, वो बस आपका हँसमुख चेहरा देख कर ख़ुशी और शांति सी मिलती है .....”.... ‘अच्छा’बोल कर मैं आगे निकल गया.... और सोचने लगा बाहरी तौर पर हम कितने भी संतुलित मालूम होते हों ....अंदर की बेचैनी का किसी को नहीं पता होता ....अंदर की बेचैनी कब कौनसा तूफ़ान ले आए , हम ख़ुद नामालूम से रहते हैं।....जीवन परीक्षाओं का पुलिंदा होता है तो हमारा अंतर्मन जज़्बाती बारूद का ज़ख़ीरा। इस अंतर्मन में विचारों की कौनसी चिंगारी कब किसी जज़्बाती बारूद के कण से मिल कर क्या क्या करवा दे ,किसे पता ।..... ये अंतस की बेचैनी जीवन को यथास्वरूप जीने नहीं देती ....ये बेचैनी ही है जो रातों को सोने नहीं देती .....ये जीवन की पक्की सड़कें छोड़ गुमनाम पगडंडियों पर चलवाती है। जहाँ काँटे ही काँटे मिलते हैं।.....ये हमारे अंदर का तूफ़ान, ये बेताबियाँ चाहे तो राजा बना राज पाट दिलवा दें। या फिर ये अंतस की बेचैनी ....जिसे सोच सोच कर मन कहता है कि हम वो नहीं जो हमें होना चाहिए ....या फिर हम वहाँ नहीं जहाँ अब तक हमें पहुँचना चाहिए ....और यही तूफ़ान ये अंदर की बेचैनी चाहती है कि हम कहीं भाग जाएँ अपने आप से दूर।

~डॉ.गुरप्रीत सिंह

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