बात उस शाम की......

दो मुख़्तलिफ़
अजनबी रास्ते
उस शाम
बस यूँ ही
ना जाने क्यूँ
कहीं मिल गए।

और 'नसीब' ने
संज़ीदगी से
कभी 'मुहब्बत' के
मरहम भरे,
तो कभी
आँख बचा
चुपके से
'ज़िंदगी' के पाँव छूए।

मगर अहसासों के
चश्मे से झाँकती
ज़िंदगी,
उसकी नादानियों पर
इठलाने के बजाय
झुँझला उठी।

शाम का एक एक कतरा
उसके फुसफुसाने
से जुगनुओं की मानिंद
जगमगा उठा।

और दूर तलक
पैरों तले वो दो
अजनबी रास्ते
साथ साथ यूँ चले.....

जैसे
मुहब्बत के ज़ुर्म में
कुछ बेक़सूर अक्षर
चुपचाप फ़ना हुए हों।

©®प्रीत/21-07-2019/बम्बई डायरी

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