बाँझ हवाओं में घुला दर्द ......

हाँ मज़लूम सी 
ज़िन्दगी मेरी
रोज़ तकती है 
फलक की पेशानी

बारिशों को तकते जैसे
धरती रो दी हो,
या कहीं दूर
बादलों का कश पीते
पहाड़ मदहोश हुआ हो।

अबकी बार कोई मौसम दस्तक दे
तो समझ जाना,
बाँझ हवाओं में घुला 
मेरा दर्द होगा..... मैं नहीं।


©®प्रीत

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