अमिया कुँवर जी के साथ पहली मुलाक़ात
तारीख 10 अगस्त 2019, ....शहर दिल्ली, घड़ी की सुईयां 10 बजकर 34 मिनट का इशारा कर रहीं थी। Amia Kunwar जी को फ़ोन किया कि आपके शहर दिल्ली में हूँ और ग्रीन पार्क रुका हुआ हूँ, उधर से आवाज़ आई -''फौरन घर आ जाओ"....फिर कुछ रुक कर बोली....''ड्राइवर भेज रही हूँ , अभी तुम्हें फ़ोन करेगा''....मैंने कहा ''अच्छा''.......हालांकि एक दिन पहले बम्बई से चलने से पहले भी बताया था कि कल दिल्ली से हो कर गुजरूँगा।........ ज्ञात हो कि बचपन से ही अमृता प्रीतम का मुरीद रहा हूँ और कालांतर में इमरोज़ जी के साथ मुलाकातों का सिलसिला रहा है .....लेकिन अमृता को ना मिल पाने का दर्द हमेशा दिल के हर इक कोने में इक आम से प्रशंसक से कहीं ज्यादा जज़्ब है।........ ख़ैर कुछ साल पहले यू ट्यूब पर देखा सुना था कि अमृता इमरोज़ के आशियाने K-25, Hauz Khas को परिस्थितिवश तोड़ दिया गया है और इमरोज़ ग्रेटर कैलाश में रहने चले गए हैं।.....उस वीडियो को मैंने कई बार देखा सुना और बारम्बार रोया....अमृता को ना मिलने का दुःख अब उसके आशियाने तक को भी ना देख पाने के दुःख के साथ जा मिला था.....वीडियो में बार बार घर के टूटे लैंटर और टूटी दीवारों से उड़ती मुहब्बत की धूल के ग़ुबार को दिखाया जा रहा था ....लैंटर पर बैठे हथौड़े चलाते मज़दूरों को शायद घर टूटने से ज्यादा ,वीडियो और फ़ोटो खिंचवाना रोचक लग रहा था......अमृता की दोस्त अजीत कौर के अलावा उस विडियो में एक और अदीब शख़्सियत भी थी (जो अमृता इमरोज की काफ़ी करीबी जान पड़ती थी) जो बार बार अमृता की इस विरासत के नेस्तनाबूद होने पर दुहाई दे रही थी, साथ ही इस घटना को व्यक्तिगत दोष ना बता कर संस्थागत विकलांगता करार दे रही थी।..... ये कोई 'अमिया कुँवर' थी। मैंने बस नाम पढ़ा और आगे बढ़ गया.....समय भी करवट ले गया। फिर एक दिन फेसबुक की दुनिया में विचरण करते हुए आँखें एक प्रोफाइल पर अटक गई.... Amia Kunwar .....नाम स्मृतिपटल से साफ हो चुका था शायद, लेकिन आँखें किसी वाबस्तगी की गवाही दे रही थी.....फ़ोटो देखते ही मालूम पड़ा कि शायद ये वो ही हैं।.......मित्रता आवेदन भेज दिया, स्वीकार होने पर मैंने बताया कि अमृता का मुरीद हूँ और आपको टी वी पर उस खबर के सिलसिले में यू ट्यूब कवरेज में देखा है। कभी मौका मिला तो मिलोगे? उधर से जवाब आया ...''जी सद के।''.......ख़ैर दुबारा 10 अगस्त 2019 पर आता हूँ....ड्राइवर गाड़ी ले आया और ग्रीनपार्क से हम मालवीय नगर की ओर निकल पड़े , ....रास्ते में हौज़ खास से निकलते हुए ऐफ एम के गीत ''देख हमें आवाज़ न देना'' के साथ ही अमृता मेरे ख्यालों में और भी गहरी होती गई , लग रहा था जैसे अमृता प्रीतम के घर ही जा रहा था उनसे मिलने।....... घड़ी की सुइयों ने 11 बजकर 17 मिनट का फरमान सुना दिया था और मालवीय नगर की एक बन्द गली के अंतिम घर के दरवाज़े को खोलते हुए एक सिहरन सिर से पाँव तक दौड़ गई......अंदर से उल्लासित दौड़ी चली आ रही शख़्सियत अमिया जी थीं।.....मैंने सिजदा किया.....सामने वही आवाज़ और वही लहज़ा.... ''जी सदके ....जी सदके, आओ आओ।'' .... अब मैं एक अबोध बालक था और वो जैसे समूचे ब्रह्मांड के राज जानती भगवती।......फौरन बातों का सिलसिला शुरू हो गया....अमृता ही अमृता....अमृता और सिर्फ़ अमृता.....अमृता इमरोज़ से जुड़े छुए अनछुए पहलुओं पर खूब चर्चा हुई।.....और बीच बीच में कुछेक बातें जो मैंने सिर्फ इमरोज़ जी से सुनी थी वो इनसे सुनने को मिलती तो उछल पड़ता कि हाँ ये बात तो मुझे भी पता है या ये बात तो मैंने सुनी हुई है।........अब तक मैं अमिया जी को एक साहित्यकार और अमृता प्रीतम जी की बेहद करीबी शख़्सियत ही समझता था..... लेकिन मालूम चला कि आपने तो अमृता की 35 पंजाबी किताबों का हिंदी अनुवाद किया है। जानकर सुखद अनुभूति हुई कि बचपन से जो 2-3 दर्जन किताबें मैंने हिंदी में पढ़ी थी उनमें से कुछ की रचयिता मेरे समक्ष थी।...... बहुत विरले ही होते हैं जो हिंदी और पंजाबी भाषा और शैली को एक समान न्याय दे पाते हैं। अमिया जी उन्हीं में से एक हैं। आप देहरादून से आती हैं और हिंदी और पंजाबी गलियारों में बराबर की साख रखती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और हिंदी, पंजाबी और उर्दू के सरहद पार समेत कवियों , शायरों और अफ़साना निगारों की दोस्त, शागिर्द रहीं हैं। .......इसलिए कहने सुनाने को इतने किस्से हैं आपके पास की क्या बताऊँ..... बात कहते कहते जिस साफ़गोई, सलीके और प्यार से बीच बीच में हँस देती हैं , लगता ही नहीं कि इतनी बड़ी शख़्सियत से मिल रहे हैं।.....जमीन से जुड़ी हैं इसलिए बात भी बुनियादी जमीन की ही करती हैं। मानव मूल्यों को अपने शब्दों में उकेरना खूबी है इनकी। बात कहने की इतनी जल्दी में रहती हैं कि मेरे जैसा शैदाई एक बार में पाँच सात सवाल उछाल कर घण्टों चुपचाप इन्हें सुन सकता है।.......साढ़े तीन घण्टे की मुलाकात साढ़े तीन मिनट की लगी।लेकिन साहित्य से जुड़ी साढ़े तीन सौ बातों के लिए काफी ही थी..... लेकिन करने को बातें हज़ारों थी..... इतना प्यार और स्नेह मिला कि क्या बताऊँ.....कुछ एहसासों की ज़बान नहीं होती.....मिलकर बहुत अच्छा लगा..... साहित्यिक चर्चा और आधुनिक साहित्य की विसंगतियों की चर्चा करते हुए एक चिंता और फिक्र के भाव हमारी बातों में आते जाते रहे। आपने अपनी किताबों और तस्वीरों की दुनिया से रूबरू करवाया। बातों बातों में बच्चों की तरह आप भी बच्चा बन गई और अपनी बेटी से बोलीं ..... "गुरप्रीत नाल मेरी फ़ोटो ता लै दे।" (गुरप्रीत के साथ मेरी फ़ोटो तो ले ले)😀😀..... बागबानी और गृहसज्जा का खास शौक रखती हैं इसलिए मैंने कुछ तस्वीरें इनकी फुलवाड़ी और घर की भी ली।......जाहिर सी बात है कि साहित्य के इस मक्का में एक अलमारी सिर्फ अमृता प्रीतम की किताबों की देख अचंभित होना नादानी ही होती.... और भी कई हिंदी पंजाबी उर्दू लेखकों शायरों की बेशुमार रचनाएं देखने को मिली.....आते हुए मुझे अपनी दो किताबें भेंट स्वरूप दी और माँ समान पास बिठा कर खाना भी खिलाया।....... संयोगवश इसी तारीख को एक साल पहले इनके हमराह 'हरप्रीत' सर दुनिया से रुख़सत हुए थे। उनको समर्पित एक नज़्म मैंने लिखी और इनको दिखाई। (भावविभोर हो बाद में आपने उस नज़्म का हिंदी तर्जुमा किया और फेसबुक पर साझा किया)......ख़ैर अब चलना था, दहलीज़ पर साहित्य की इस मूरत के पैर छू कर मुड़ा ही था कि रुक गया। सफेद पत्थर की सीढ़ियों पर हर जगह साफ़ साफ़ लिखा हुआ दिखा..... मुहब्बत ....मुहब्बत ......मुहब्बत। मैंने झुक कर हथेली पर कुछ सुनहरी कण उठा माथे पर लगा लिए और लौट आया।.....दिल में इक तसल्ली भी थी और दुआ भी कि दिल्ली के मालवीय नगर में मुहब्बत की इस इबादतगाह का हर इक कोना यूँ ही रौशन और खुशहाल रहे।













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