ताजमहल- इक ज़िद इक सपना
वैसे एक कहावत है इंसान ग़लतियों का पुतला होता है ....सहमत हूँ , लेकिन मेरा ख़्याल है हर इंसान सपनों का भी पुतला होता है। हरेक सपने की अपनी अपनी उम्र होती है क्यूँकि ज़िंदगी के सफ़र में हर एक अवस्था और बौद्धिक स्तर पर सपने भी अनोखे और अलाहिदा होते हैं।.....कुछ सपने हमारी सोच और समझ के साथ पनपते हैं तो कुछ सपने हम नन्ही आँखों से बचपन में ही देख लेते हैं।....’ताजमहल को देखना’ भी उन नन्हे दिनों के सपनों में से एक है..... जब स्कूल में एक कार्यशाला का आयोजन हुआ था ....मेरी बहन मीनू मुझसे दो जमात आगे थी स्कूल में।हम दोनों ने ही उस कार्यशाला में भाग लिया ...विभिन्न चित्रों को ट्रेसिंग/बटर पेपर की सहायता से ट्रेस करके बनाया और फिर उस बटरपेपर को सरसों के तेल में भिगो कर के उन चित्रों को oilपेण्टिंग की मानिंद फ़िक्स करके अपनी अपनी copies में यादगार बना रख लिया था। .....उन चित्रों में ताजमहल का चित्र सबसे हूबहू बना था इसलिए ताज की छाप सरसों के तेल से सने उस बटर पेपर जैसे मेरे बाल अंतर्मन पर भी ज़िद्दी सी फ़िक्स कलाकृति की तरह छप गई थी.....सरकारी नौकरी में चार साल से होने के बावजूद कभी ताज को निहारने का मौक़ा नहीं मिला लेकिन तक़दीर होनी सब कुछ हमसे ही लिखवा देती है .....पिछले दिनों ही अचानक मन में आया कि क्यूँ ना आगरा हो आऊँ.....ऐसा नहीं कहूँगा कि ज़िद्दी बावरे शैदाई मन को तीखे मौसम के तेवर का ख़्याल नहीं आया और ना ही अपने दृढ़ संकल्पी होने के भुलावे से आपको अभिभूत करने की कोशिश करूँगा......ख़ैर फिर क्या था ,बम्बई की अच्छी भली सुंदर बारिशें छोड़ शैदाई मन की औरंगजेबी सेनाओं ने बीते शनिवार यानि 07 सितम्बर 2019 को दिल्ली की ओर कूच किया.....हालाँकि दो दिन के हल्के फुल्के दिल्ली भ्रमण ने आगरा के ख़्याल की हवा तो निकाल दी थी पर होनी ज़िंदगी सबजेक्ट की कापियाँ पहले ही चेक करके बैठी थी।इसलिए बिना किसी पूर्व योजना के कल रात ही अंगुलियाँ फ़ोन के टच पैड पर थिरकनी शुरू हुई......दिल्ली से आगरा की गाड़ियों की फ़ेहरिस्त देखते देखते दिमाग़ की फिर लंका लग गई वो तो भला हो एक अज़ीज़ मित्र का जिन्होंने सबसे विश्वसनीय गाड़ी गतिमान इक्स्प्रेस का नाम सुझाया और मैंने फटाफट इसमें आज सुबह जाने की टिकट बुक करवा दी।..... ज्ञात हो कि सुबह 8.10 बजे चल कर यह लोहपथगामिनी 9.50 बजे ही आगरा कैंट पहुँचा देती है।इसलिए रात को थके मन से बचपन से देखे उस ताज महल की कल्पना ले सो गया। सुबह 5.30 बजे उठा और 6.40 बजे मालवीय नगर से ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन तक ख़ुद अमिया जी छोड़ने आयीं।......7 बजे समयपुर बादली की ओर जाने वाली मेट्रो पकड़ी और 7.30 पर जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा और देखा कि नियत समय से 40 मिनट पहले पहुँच गया हूँ तो अहसास हुआ कि आज पहली बार ज़िंदगी कितनी आसान सी लग रही है। ख़ुद के समय पाबंद होने पर गर्व सा भी हुआ क्यूँकि इतना margin तो कभी हवाई यात्रा में भी नहीं रखा।.....पर जल्दी ही पता चला कि हमेशा की तरह आज भी ज़िंदगी को मुझे ‘मिल्खा’बनाने की मसखरी सूझी है। १६ नम्बर प्लेटफ़ार्म की एक टी स्टॉल वाले सज्जन से बहुत ही सावधानीवश जब प्लैट्फ़ॉर्म ४ और गतिमान इक्स्प्रेस का मामला पूछा तो जवाब सुन होश फ़ाख्ता हो गये।......जनाब ऐसे बिगड़ के बोले जैसे हमने भांग पी कुछ पूछा हो। तपाक से बोले “गतिमान तो निज़ामुद्दीन स्टेशन से जाती है”.;... मैंने टिकट ध्यान सेदेखी तो अब तक ‘नई दिल्ली ‘ समझा गया शब्द अब कंधे उचका कर ‘निज़ामुद्दीन निज़ामुद्दीन’ कह अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ चुका था। ग़लती तो हुई थी लेकिन ताज के बजाय दिल्ली रुकने के ख़्याल ने ही देह में सिहरन पैदा कर दी थी।......मिल्खा बने बिना अब गुज़ारा नहीं था। ऑटो वाले को २५० रुपए और २० मिनट के क़रार में बाँध जैसे तैसे ७.५५ पर सराये काले खान यानि कि निज़ामुद्दीन स्टेशन के प्लैट्फ़ॉर्म ४ पर गतिमान इक्स्प्रेस के दर्शन किए।.......थोड़ी देर में गतिमान तो शताब्दी से भी तेज़ चलती पाई। १० बजे आगरा कैंट स्टेशन पर उतरते हुए अल्लामा इक़बाल साहब की ये सतरें ज़ेहन में शिरकत कर गई
अय आबे रुदे गंगा
याद है तुझे वो दिन
उतरा तेरे किनारे
जब कारवाँ हमारा......
चूँकि उस वक़्त (यानि कि आज) तारीख़ की बही में 09.09.2019 को पहली बार उत्तरप्रदेश की धरती को छुआ तो लगा जैसे नील आर्म्स्ट्रॉंग ने चंद्रमा पर क़दम रख दिया।......धूप के तेवर देख सन स्क्रीन का शुगल भी पूरा कर लिया था आज....ओला टैक्सी वाले ने ताज महल से ५०० मीटर पहले ही छोड़ दिया था....आगे ताँगा वाला हुलस कर प्रकट हुआ तो १०० का अस्सी रुपए करवा फिर थोड़ा सा ख़ुद पर इतरा लिया।ख़ैर जल्दी ही पता चल गया कि सड़कों पर अंगारे बिछे हों तो ताँगा क्या विक्टोरिया वाली शाही बग्गी भी हो तो तबियत ख़ुशगवार से पतीली हो सकती है।......पर कुछ भी कहो ताज का सूरूर और भी सुंदर हो कल्पित मन में थिरकने लगा। सारी फ़साद की जड़ वो ताज की चोटी पकड़ कर खिंचवाई हुई तस्वीरें हैं जो बचपन से देखते आया हूँ। आज मैं भी वैसा photographer पकड़ के पहले वो ताज की चोटी ही ठीक करूँगा।.....रास्ते में सुप्रसिद्ध पंछी पेठे वाले से अंगूरी पेठा भी ले लिया। ताँगा अपनी रफ़्तार से कुछ कम सरपट चला जा रहा था.....ताज को देखने की बेकली अब बढ़ती जा रही थी। दुनिया के सारे रंग सफ़ेद रंग से कैसे हारे.....अगली पोस्ट में।
अय आबे रुदे गंगा
याद है तुझे वो दिन
उतरा तेरे किनारे
जब कारवाँ हमारा......
चूँकि उस वक़्त (यानि कि आज) तारीख़ की बही में 09.09.2019 को पहली बार उत्तरप्रदेश की धरती को छुआ तो लगा जैसे नील आर्म्स्ट्रॉंग ने चंद्रमा पर क़दम रख दिया।......धूप के तेवर देख सन स्क्रीन का शुगल भी पूरा कर लिया था आज....ओला टैक्सी वाले ने ताज महल से ५०० मीटर पहले ही छोड़ दिया था....आगे ताँगा वाला हुलस कर प्रकट हुआ तो १०० का अस्सी रुपए करवा फिर थोड़ा सा ख़ुद पर इतरा लिया।ख़ैर जल्दी ही पता चल गया कि सड़कों पर अंगारे बिछे हों तो ताँगा क्या विक्टोरिया वाली शाही बग्गी भी हो तो तबियत ख़ुशगवार से पतीली हो सकती है।......पर कुछ भी कहो ताज का सूरूर और भी सुंदर हो कल्पित मन में थिरकने लगा। सारी फ़साद की जड़ वो ताज की चोटी पकड़ कर खिंचवाई हुई तस्वीरें हैं जो बचपन से देखते आया हूँ। आज मैं भी वैसा photographer पकड़ के पहले वो ताज की चोटी ही ठीक करूँगा।.....रास्ते में सुप्रसिद्ध पंछी पेठे वाले से अंगूरी पेठा भी ले लिया। ताँगा अपनी रफ़्तार से कुछ कम सरपट चला जा रहा था.....ताज को देखने की बेकली अब बढ़ती जा रही थी। दुनिया के सारे रंग सफ़ेद रंग से कैसे हारे.....अगली पोस्ट में।















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