सुर्खी-बिंदी
परसों दिल्ली के सुभाष नगर PVR में गुरनाम भुल्लर और सरगुन मेहता अभिनीत पंजाबी फ़िल्म “ बिंदी सुर्खी “ देखने का सबब बना।....ज़्यादातर मेरे साथ ऐसा ही होता है कि बिना किसी फ़िल्म का ट्रेलर देखे मैं कभी भी कोई फ़िल्म देख आता हूँ। फ़िल्म पंजाबी है लेकिन बात हिंदी में कहूँगा ताकि ज़्यादातर लोग जो भाषागत बाध्यता के कारण पंजाबी फ़िल्मों से महरूम रह जाते हों उन तक भी इसकी बात पहुँचे।.... फ़िल्म की कहानी सुखविंदर (गुरनाम भुल्लर ) की पत्नी रणदीप(सरगुण मेहता) के सपने के इर्द गिर्द घूमती है .....वो सपना जो सिर्फ़ उस अकेली रणदीप का नहीं उस जैसी कई लड़कियों का हो सकता है .....चूँकि फ़िल्म ग्रामीण अंचल की है इसलिए सुखविंदर का किरदार कम पढ़े लिखे लेकिन बेहद संजीदा ग्रामीण पति का दिखाया है जो स्वभाव से सरल तो है ही ....साथ ही रणदीप के सपनों का संरक्षक भी।कैसे वो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी बिना विचलित हुए रणदीप का साथ देता है, बिना कोई सवाल किए उसके पंखों को उड़ान देता है , यह अपने आप में बड़ी बात है.........एक आदर्श पति , भाई और दामाद की शक्ल में सुखविंदर कथानक को और भी सुदृढ़ता दे रहा है। ‘अभिमान’और ‘की एंड का ‘ जैसी फ़िल्में देखने के बाद इस फ़िल्म में कहीं कहीं सुखविंदर का किरदार काल्पनिक सा जान पड़ता है.......फ़िल्म की कहानी में कोई मोड़ और रोमांच नहीं लेकिन फ़िल्मांकन और किरदार बख़ूबी अपनी छाप छोड़ते हैं।फ़िल्म के गाने कहीं कहीं फ़िल्म के दृश्यों से तारतम्य नहीं बिठा पाते लेकिन ये बात फ़िल्म को कहीं से भी हल्का नहीं कर रही।.....सरगुन मेहता ने पिछले कुछ बरसों में अपने आप को पंजाबी सिनेमा में भी अच्छे से स्थापित किया है। फिर चाहे वो फ़िल्म हो या ऐल्बम... हँसना हो या बिलखना, वो अपने स्तर पर किरदार को जी लेती हैं। हालाँकि गुरनाम भुल्लर अब तक सिर्फ़ गीत गाते आए हैं लेकिन बाक़ी पंजाबी गायकों की तरह उन्होंने भी अभिनय की अपनी पारी को हवा दी है .....इस फ़िल्म में उनके चॉक्लॉटी और आदर्श रोल के कारण पंजाबी सिनेमा को उनमें काफ़ी संभावनाएँ नज़र आ सकती हैं।हर इंसान चाहे वो औरत हो या मर्द उसके सपनों की आज़ादी की पैरवी करने वाले हर शख़्स को ये फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए।

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