बचन का बिन्नी

कुछ कहानियाँ लिखता कोई और है लेकिन जीते हम ख़ुद हैं ....बचपन से मेरे साथ यह संयोग अक्सर होता रहा है। इसे अपनी अवलोकन क्षमता कह कर वाहवाही लूटूँ या कि अपना पागलपन कहूँ , किताब हिंदी की होती या अंग्रेज़ी की मैं उसके अध्यायों के किरदारों में खो जाता।उसी दौर में स्कूल की हिंदी की किताब में मोहन राकेश की एक कहानी पढ़ी थी -“आर्द्रा”..... कहानी अंदर तक इतनी ज़्यादा छप गयी थी कि मुझे इसके एक एक शब्द से मेरा जन्मों का वास्ता लगता था। मैं चाहे बालमन से बड़ा हो गया हूँ लेकिन आज भी मेरे अंतस के आँगन की मिट्टी में इस कहानी के किरदारों के संवाद और संवेदनाएँ इस क़द्र मौजूद हैं जैसे मेरा मन इस कहानी का अपना ही घर हो।

पिछले सोमवार माँ को लेने दादर(बम्बई) स्टेशन गया तो ये कहानी मेरे अंदर शुरू हो गयी और पिछले आठ दिन माँ के साथ बम्बई में ये कहानी मेरे साथ साथ चली .....आज सुबह बम्बई एयरपोर्ट पर माँ को विदा करते हुए कहानी का सारा कथानक मानों चक्करघिन्नी सा दिल की दीवारों से टकरा अहसासों की मुँडेरें फाँद गया।

‘’आर्द्रा’’ एक माँ की कहानी है। उस माँ -‘बचन’ की कहानी ,जिसके दो बेटे हैं ,छोटा बेटा ‘बिन्नी’ जो बम्बई की किसी मनहूस बस्ती में झोपड़ीनुमा जगह में रहता है ,का जीवन आंशिक रोज़गार के चलते असंतुलित है। लेकिन वो अपने इस अस्त व्यस्त निर्धन जीवन में ही इतना ज़्यादा मशगूल और संतुष्ट है कि कोई भी सुख सुविधा उसके दार्शनिक जीवन को प्रभावित नहीं कर पाती....लेकिन बचन का दिल एक माँ का दिल है वो बिन्नी के इस अस्त व्यस्त, बिखरे निर्धन और निकम्मे जीवन पर खीज उठती है, ....इस बदबूदार और गंदे मुहल्ले में पिय्यकड़ों के पड़ोस में बिन्नी का रहना उसे बड़ा अखरता है ....दूसरी ओर बचन का बड़ा बेटा ‘लाली’ ,जो कि कलकत्ता शहर में वक़ील है , पढ़ा लिखा लायक़ वक़ील है, कभी कभी माँ को ख़त लिखता है ...लाली का ख़त बिन्नी बेमने से फटाफट पढ़ कर माँ को सुना देता है .....जैसे जैसे कहानी का कथानक आगे बढ़ता है बचन की बिन्नी के साथ रहने की खीज बढ़ती जाती है क्यूँकि लाली ने ख़त में लिख भेजा है कि उसकी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती....डॉक्टर ने खुले वातावरण में रहने को कहा है इसलिए वो लोग दूसरे मकान में रहने चले गए हैं.....बचन यह सब सहन नहीं कर पाती और फ़ौरन लाली के पास जाने का मन बना लेती है। बिन्नी कैसे भी कहीं से पैसे उधार लेकर भारी मन से उसे स्टेशन छोड़ने आता है ......कलकत्ता आ कर बचन को अहसास होता है कि उसका बड़ा बेटा लाली इतना ‘बड़ा’ है कि उसके सामने वो ख़ुद को छोटा सा महसूस करती है।अपने मुवक्किलों और क़ानूनी काम काज में दिन रात व्यस्त लाली शहरी जीवन में इतना रम गया है कि माँ की ममता उस तक सूरज की मरी हुई किरण सी पहुँचती है। लाली के घर में नौकर चाकर हैं और उनको निर्देश देती लाली की पत्नी है जिसका बचन के साथ शिष्टाचार वाला सम्बंध है।लाली के घर में बचन के पास सब सुविधाएँ हैं और करने को धेला काम नहीं फिर भी सारी सारी रात उसे नींद नहीं आती......यहाँ छोटे बेटे बिन्नी के वो बम्बई वाले नालायक़ और निकम्मे दोस्त भी नहीं जो जब तब घर आते सारी दाल रोटी चट कर जाते और कभी कभी उसके खाने लायक़ कुछ बचता ही ना।......यहाँ लाली के शिष्ट सभ्य दो बच्चे हैं जिनमें दादी के प्रति अनुराग की अपेक्षा शिष्टाचार है। वो रोज़ सोचती है जब काम करने के लिए नौकर चाकर और उनका ध्यान रखने के लिए लाली की पत्नी है तो वो यहाँ क्यूँ है??.....यह विचार उसे अंदर तक हिला देता है और उसे अपने छोटे नालायक़ मगर प्यारे बेटे बिन्नी की याद आती है और वो उसके पास बम्बई लौट जाती है......’आर्द्रा’ सम्पन्न और दरिद्र बेटे के बीच पिसती माँ की कहानी होती तो शायद मुझे अब तक याद भी ना रहती।...ये तो समंदर से निकल ‘सूखे तट’ को चूमती लहर सरीखी उस माँ की कहानी है जो वापिस समंदर में मिलना नहीं चाहती.....ये कहानी इस क़द्र मेरी धमनियों में लहू सरीखी दौड़ती है कि माँ की गोद में सर रख ‘बिन्नी’ के ये शब्द मेरे मुँह से निकल पड़े “माँ, तेरा छोटा लडक़ा कपूत है न?"

DrGurpreet Singh








Comments

मां तो मां होती है और बेटा लडडू ..मासूम ,परिपक्व और संवेदनशील..����

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