मेरी बेबे ‘प्रकाश कौर’

आज मेरी दादी प्रकाश कौर की 9वीं पुण्यतिथि है। 22.12.2010 की काली शाम लगभग सवा 5 बजे मेरी प्यारी दादी इस दुनिया को अलविदा कह गई थी।....मेरी दादी का जन्म 1927 को बहावलपुर के नूरसर चिश्तियाँ (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। 12 वर्ष की छोटी सी उम्र में मेरे दादाजी स्व.स. अमर सिंह जी से शादी हुई जो उम्र में मेरी दादी से 2 साल बड़े थे और श्रीगंगानगर निवासी थे।इसलिए शादी के बाद दादी श्रीगंगानगर (राजस्थान) में ही रहने आ गई और अंतिम श्वास तक लगभग 70 साल श्रीगंगानगर में ही रहीं। लिखने बैठूँ तो बहुत कुछ है मेरी बेबे के बारे में, ....(हम पंजाबियों के घरों में माँ या दादी को प्यार से बेबे ही बुलाते हैं, हमारे घर में दादी को हम सब बेबे बुलाते थे)......बहुत कुछ इसलिए है बताने को.......क्यूँकि बचपन से ही बहुत क़रीब रहा हूँ बेबे के। सुबह बेबे को मक्खन निकालते देखने से लेकर , चरख़ा चलाने, चक्की पर आटा पीसने, दाल दलने, छोलिया निकालने, सरसों का साग सुखाने, आलू चिप्स और लाल साबुत मिर्च धूप में सुखाने, गेहूँ , बाजरा , मक्का संग्रहण हर बात में बेबे की हाज़िरी अनिवार्य सी होती थी।....घर में कोई भी काम होता, बेबे की मौजूदगी कह लो या मुखत्यारी , हम सबको तसल्ली रहती थी कि बेबे को पता है चलो। ......हम में से कोई भी बीमार होता तो जितनी देर तक वो सिरहाने आ कर माथे पर अपना ज़िद्दी सख़्त हाथ नहीं फेरती थी , ठीक होने का सवाल ही नहीं उठता था। ........माँ की नज़र बचा कर कोई शरारत करते पकड़े जाते तो भी बेबे के पास ही शरण मिलती थी। वो झट कलेजे से लगा लेती थी।......हमें शरण मिल जाती और उसकी सूखी छातियाँ हरी हो जाती।फिर काफ़ी देर तक अपने पास बैठाए रखती। हंस कर कह देती..... ‘स्कूल दा कम्म करके आ जायीं, मेनू अख़बार पढ़ के सुनाईं’.....और अगर हम उस से भी शरारत करते तो इतना ज़ोर ज़बर था बेबे में कि हमें नानी याद दिला देती।.....तीसरी कक्षा तक मैं और मेरी बहन मीनु (पाँचवीं तक) जिस स्कूल में पढ़े ....वो हमारे घर से 8-10 घर के फ़ासले जितना ही दूर था। बेबे गरमियों में रोज़ लोटे में शिकंजी (नींबू पानी) ले कर पहुँच जाती... और स्कूल के बाहर खड़ी हो कर ऊँचे स्वर में पुकारती,.....”नोनू !!मीनू!! शिकंजवी पी लो आके”....बाल मन भी कितना अबोध होता है ना,...हम सब कुछ छोड़ छाड के स्कूल के गेट पर आ जाते और उसी एक स्टील के ग्लास से शिकंजवी पी कर वापिस अपनी क्लास में भाग जाते। ....आज भी वो तेरी ज़्यादा मीठे वाली नींबू के बीज समेत खट मीठी शिकंजवी बड़ी याद आती है बेबे!......बेबे बड़ी सादगी पसंद थी या क्या , लेकिन अपने अच्छे सूट जो कहीं से मिलते या ख़रीदे जाते....सिलवाती नहीं थी, बाँट देती थी।.....गर्मी की दोपहरियों में जब हम दूरदर्शन पर तरंग सिरीयल देखा करते तो बेबे भी कभी कभी हमारे साथ बैठ जाती।बी आर चोपड़ा साहब की महाभारत -रामायण हो या अलिफ लैला और विक्रम बेताल ,बेबे ने हम बच्चों के साथ सब कुछ देखा।......गर्मी के दिनों में स्कूल से आते ही बेबे को ढूंढ़ते थे फिर कुछ काम करने का सोचते थे....वो घर ना होती तो थानेदार की तरह पूछ पड़ताल करते, जब तक ना आती बेचैन रहते।.....राजस्थान में गर्मी बहुत पड़ती है इसलिए दिन में ख़ाना खा कर सोने का रिवाज सा है....सब सो जाते पर मैं और बेबे ना सोते तो वो मुझे बार बार क़िस्से सुनाया करती। पढ़ी लिखी नहीं थी ज़्यादा , पर भगत पूर्ण, रूप बसंत , हीर रांझा, मिर्ज़ा साहिबा , गोपीनाथ , मछिन्दरनाथ के चिट्ठे उसे हुबहू याद थे......कभी सुनाते ना थकती थी।.....मैं उसे प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ कर सुनाता।....नंदन , बाल भास्कर से राजतंत्र की कहानियाँ सुनने में उसे बड़ा मज़ा आता।....अख़बार में कोई फ़ोटो देख लेती तो मेरे स्कूल से घर आने तक इंतज़ार करती और सबसे पहले उस ख़बर के मायने बताने को कहती।मैं भी अपने आप को जाने क्या समझ बैठता, और ज़ोर ज़ोर से ऊँचे स्वर में सुनाने बैठ जाता।.....शाम को डोरिए वाला कुर्ता पहन कर बेबे की उँगली पकड़ उनकी सहेली तारो के घर दूध लेने जाता। शाम को दूध भी बेबे ही गरम करके देती। और अपने कांपते हाथों से टी वी वाले कमरे तक सब बच्चों को पकड़ाने जाती।.....सर्दी के दिनों में सरसों का साग ख़ाना बड़ा आसान लगता पर आज उस चूल्हे पर सारा दिन पके साग की क़ीमत समझ में आती है। कितना पालक डालना है कितना सरसों कितना मक्की आटा, बेबे को सब पता होता था।सारा दिन साग को धोने ,साफ़ करने,कटने में लग जाता था।.....माँ और बेबे की मेहनत से बना साग हम बच्चे चाहे नाक सिकोड़ कर खाते थे....पर आज भी वो स्मृतियाँ बुझे चूल्हे में फूँक मारती बेबे की तरह दिलोदिमाग़ पर वैसे ही उकड़ूँ बैठी हैं। कश्मीर से जो राशा करीम चाचा हर साल हमारे घर शौल सूट कम्बल रख कर जाता, उसका बेबे से इतना लगाव था कि अपने पास बैठा कर उसकी पूरी बातें सुनती, उसको चाय बिस्कुट खिलाती या अपनी लकड़ी और जाली वाली छोटी सी अलमारी से लड्डू बालुशाही बर्फ़ी या ऐसी ही कोई चीज़ ख़ाने को देती, पर उसूलों की इतनी पक्की थी कि मुफ़्त कोई चीज़ ना लेती। .........हिसाब किताब और यदाश्त में इतनी अच्छी थी कि हमारा कलेंडर पर लिखा हुआ दूध का हिसाब भी बेबे के मुँहज़बानी हिसाब के आगे पानी माँगता नज़र आता।.......सर्दी के दिनों में धूप मे कीनू रखना हो राख में शकरकंदी भूनना, बेबे ज़िंदगी के हर खट्टे मीठे स्वाद में याद रहेगी। दिलेर इतनी थी कि जब मैं नया नया मोटरसाइकल चलाना सीखा तो शुरुआती दिनों में वो ही थी जो मर्दानी बन मेरे पीछे बैठ जाती और मेरी हौसलाअफ़्जाई करती। अपने उसी जोश में कहती रहती ........“फ़िक्र ना कर, कुछ नहीं हुँदा,मैं तेरे नाल हैं”.....
बेबे हालाँकि हिंदुस्तानी तकसीम से पहले ही वर्तमान हिंदुस्तान में रहने आ गई थी लेकिन पाकिस्तान के अपने पुराने मायके घर के बड़े क़िस्से सुनाया करती.....सुनने वालों में मैं सबसे आगे होता। बताया करती कि कैसे सिख मुसलमान  
भाई बहनों की तरह रहा करते थे.... बड़ी बड़ी हवेलियों की बातें बेबे की आँखों से हवेलियों की खोई हुई चाबियों की  तरह झरती रहती। .......बेबे के बड़े भाई वहाँ बहावलपुर में नायब तहसीलदार थे। आज़ादी के बाद श्रीगंगानगर के आस पास ही गाँवों में ज़मीनें अलौट करवा कर बस गए , लेकिन बेबे की आँखों की नमी साफ़ बया करती थी....उजड़ कर आए मायके और तकसीम में मारे गए बेक़सूर लोगों का दर्द .....बहावलपुर की गलियों को फिर से देखने की हसरत जो अंतिम साँस तक रही, बेबे अपने साथ अधूरी ही ले गई। ................ इतनी दिलेर मेरी बेबे दिल की मरीज़ भी हुई और अचानक चलती फिरती आज ही के दिन शाम सवा पाँच बजे थम गई पर उसकी याद ,उसकी आवाज़ ज़िंदगी के कई मायनों में मेरी सोच पर हावी होती रहेगी।.......तेनू बौहत प्यार बेबे।




Comments

लाजवाब बेबे होरां दा लाजवाब पोतरा!!
ख़ुशी के आंसू अभी भी अटके पड़े हैं , पता नहीं क्यों अश्रुधारा ना बनी ! हैरान हूँ !!
मुझे अपनी बीजी और मेरे बेटों से उनका रिश्ता चेते आ गया अज्ज फेर !!
बेबे दी निग़ी याद नू सलाम!

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