सहमा सा मेरा शहर- 22 मार्च 2020
अभी स्टेशन से उतरा तो 2017 के मेरे श्रीनगर के दिन याद हो आए। जब हेड हवलदार क़ुरैशी के साथ सदर कोर्ट रोड से लाल चौक जाते हुए मैं बंद हुई दुकानों और सड़कों को देख हैरान हुआ पूछ बैठता था .....”क़ुरैशी आज भी कर्फ़्यू लग गया क्या? “.... तो वो खिसिया निपोरे कह देता
...”सर ! कर्फ़्यू लगे ना लगे आपाँ नू की फ़र्क़ पेंदा ??
और सुबह सुबह संतूर होटेल में आ कर जब वो ज़िद करता कि चलो घूम कर आते हैं सर.... तो मैं मज़ाक़ में कह देता कि मेरे लिए शलवार ले कर आओ फिर चलूँगा.... 😂....और किसी शाम बादशाह ब्रिज पर से होते हुए जब निकलते तो क़ुरैशी कहता “ सर कुछ दिन पहले आर्मी की गाड़ी उड़ाई थी इस ब्रिज पर से” .....और मैं सिहर उठता तो वो बच्चों की तरह खिलखिला कर हँस देता ....तब उसका चेहरा लाल गोश्त जैसा लगता।.....वही गोश्त जो डल झील के पास शाम को टहलते हुए उसका खाने का मन होता ,पर चूँकि मैं नहीं खाता तो वो भी नहीं खाता.....बस बच्चों की तरह देखता रहता......फिर किसी शाम गुरुद्वारा सिंह सभा के पास से गुज़रते हुए वो कहता कि “चलो सर ! गुरुद्वारा छटी साहिब चलें ...” तो मैं कहता कि ये सिंह सभा है छटी पातशाही दूसरी तरफ़ है ..... तो हँस के कह देता ओ कि फ़र्क़ पेंदा सर! वाहेगुरु तो सब में है ना .....और हम बस हँस देते।..... और वो दिन जब उसने फ़ोन पर कहा कि वो सेंट्रल मार्केट में है थोड़ी देर में आएगा और मैं लाल चौक के पास वाले आइसक्रीम पार्लर के पास से गुज़र रहा था तो काँच के उस पार क्या देखा कि लाट साहब किसी मोहतरमा को बड़ी नज़ाकत से आइसक्रीम खिला रहे हैं..... उसके बाद से जब भी उस आइसक्रीम पार्लर के सामने से हम दोनों गुज़रते, मैं उसे चिढ़ाने के लिए पूछ लेता.....”क़ुरैशी ! वो उस दिन आइसक्रीम का फ़्लेवर कौनसा था.... “ और वो हँसते हँसते फिर गोश्त जैसा हो जाता.........क़ुरैशी और उसके क़िस्से हमेशा मेरे साथ मेरे ज़ेहन में रहेंगे।.....
#जनता_कर्फ़्यू_श्रीनगर_की_यादें
...”सर ! कर्फ़्यू लगे ना लगे आपाँ नू की फ़र्क़ पेंदा ??
और सुबह सुबह संतूर होटेल में आ कर जब वो ज़िद करता कि चलो घूम कर आते हैं सर.... तो मैं मज़ाक़ में कह देता कि मेरे लिए शलवार ले कर आओ फिर चलूँगा.... 😂....और किसी शाम बादशाह ब्रिज पर से होते हुए जब निकलते तो क़ुरैशी कहता “ सर कुछ दिन पहले आर्मी की गाड़ी उड़ाई थी इस ब्रिज पर से” .....और मैं सिहर उठता तो वो बच्चों की तरह खिलखिला कर हँस देता ....तब उसका चेहरा लाल गोश्त जैसा लगता।.....वही गोश्त जो डल झील के पास शाम को टहलते हुए उसका खाने का मन होता ,पर चूँकि मैं नहीं खाता तो वो भी नहीं खाता.....बस बच्चों की तरह देखता रहता......फिर किसी शाम गुरुद्वारा सिंह सभा के पास से गुज़रते हुए वो कहता कि “चलो सर ! गुरुद्वारा छटी साहिब चलें ...” तो मैं कहता कि ये सिंह सभा है छटी पातशाही दूसरी तरफ़ है ..... तो हँस के कह देता ओ कि फ़र्क़ पेंदा सर! वाहेगुरु तो सब में है ना .....और हम बस हँस देते।..... और वो दिन जब उसने फ़ोन पर कहा कि वो सेंट्रल मार्केट में है थोड़ी देर में आएगा और मैं लाल चौक के पास वाले आइसक्रीम पार्लर के पास से गुज़र रहा था तो काँच के उस पार क्या देखा कि लाट साहब किसी मोहतरमा को बड़ी नज़ाकत से आइसक्रीम खिला रहे हैं..... उसके बाद से जब भी उस आइसक्रीम पार्लर के सामने से हम दोनों गुज़रते, मैं उसे चिढ़ाने के लिए पूछ लेता.....”क़ुरैशी ! वो उस दिन आइसक्रीम का फ़्लेवर कौनसा था.... “ और वो हँसते हँसते फिर गोश्त जैसा हो जाता.........क़ुरैशी और उसके क़िस्से हमेशा मेरे साथ मेरे ज़ेहन में रहेंगे।.....
#जनता_कर्फ़्यू_श्रीनगर_की_यादें


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