14 जून -शहर नहीं छूटता- नागपुर शहर


तेरे शहर में 
आखिरी रात,
जैसे चाय के 
जूठे प्याले में बची 
आखिरी घूँट।

हम शहर को छोड़ते हैं, शहर हमें कभी नहीं छोड़ता, कहीं का नहीं छोड़ता।....नागपुर शहर जिसमें मेरी पहली नौकरी लगी थी, आज उसे छोड़े हुए चार बरस हो गए। समय कितनी तेजी से दौड़ता है ना। 14 जून 2016 नागपुर ऑफिस (भारत सरकार) से रिजाइन दे कर 15 जून 2016 को बम्बई शहर में दूसरी (भारत सरकार की) नौकरी जॉइन करनी थी।...मन में उत्साह भी था और घबराहट भी। उत्साह था नौकरी का और घबराहट थी सबसे बड़े शहर की आपाधापी की। हालाँकि बम्बई ने जो इन सालों में सिखाया वो शायद हिंदुस्तान का और कोई शहर न सिखा पाता पर ये बात नागपुर छोड़ते हुए समझ में आई कि नागपुर की गर्मी और अल्प विकसित शहरीकरण की जितनी दुहाइयाँ देता आया था सब उस दिन बेमानी हो गई, जब 14 जून 2016 को ऑफिस में रिजाइन देने के बाद रेसिग्नशन लेटर हाथ में आने वाला था, तब मन कर रहा था कि काश कुछ हो जाये....कोई एक बार थोड़ा सा रोक ले। कहीं नहीं जाना ...यहीं रहना है।....पर जब बम्बई से अमृतसर इंटेलीजेंस में गया तो लगा नियति यही होती है ....हम शहरों को छोड़ते हैं, शहर हमें कभी नहीं छोड़ते। एक एक शहर,उसके लोग, उसकी खुशबू, उसकी संस्कृति ,उसके लोग, उसके अनुभव, उसके दिन एक एक तह लगा कर मन के सन्दूक में बिछते जाते हैं।.....शहर स्मृतिओं के आँगन होते हैं जिसकी सौंधी मिट्टी की खुशबू हमारे पैरों में हमेशा बनी रहती है। कमजोर था मेरे लिए नागपुर छोड़ना, अब कोशिश कर रहा हूँ कि किसी शहर से मोह ना रखूँ पर संवेदनशील मन का क्या किया जाए। तुम हमेशा याद आओगे मेरे प्यारे नागपुर।

DrGurpreet Singh
#Nagpur_Memories

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