शुभ मंगल ज़्यादा सावधान- फ़िल्म समीक्षा
बॉलीवुड के ‘टेबू मैन’ आयुषमान खुराना की एक और टैबू बेस्ड फ़िल्म। आयुषमान ने आज तक ज़्यादातर सामाजिक विषयों पर ही फ़िल्में की हैं और अपनी फ़िल्मों और अभिनय से किसी ना किसी संदेश को जनमानस तक पहुँचाने में अब तक सफल भी रहे हैं। “शुभ मंगल ज़्यादा सावधान” फ़िल्म भी ‘पुरुष समलैंगिकता’ जैसे संवेदनशील विषय पर ही आधारित फ़िल्म है। ऐसी बात नहीं है कि भारतीय फ़िल्म जगत की पृष्ठभूमि और इस देश की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसी फ़िल्म बनाई ही नहीं जा सकती वरन इससे पहले भी कई बार इस विषय को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यदाकदा किसी ना किसी फ़िल्म के कथानक या चरित्र के ज़रिए दर्शाया जाता रहा है और आजकल की मल्टीस्टारर फ़िल्मों में यह कोई बड़ी बात भी नहीं लेकिन जब विशेष रूप से इसी विषय पर केंद्रित कोई फ़िल्म बनाने की बारी आती है तो या तो फ़िल्म में गम्भीर मसाला ज़्यादा डाल दिया जाता है या हँसी के फ़व्वारों में विषय की पटरी से फ़िल्म की कहानी अक्सर उतर जाती है। क़रीब 10-12 साल पहले इसी विषय पर आई फ़िल्म ‘दोस्ताना’ के बाद जब आयुशमान ने इस विषय का बीड़ा उठाया होगा तो उस फ़िल्म के मापदंडों को एक बार ज़रूर आँका होगा। इंटरवेल से पहले की फ़िल्म में एक दो ट्विस्ट होने के कारण फ़िल्म रोचक ज़रूर जान पड़ती है लेकिन कंटेट के अभाव में बड़ी जल्दी लड़खड़ा भी जाती है। आयुशमान अपने साथी फ़िल्म एक्टर को बार बार ऑनस्क्रीन चुम्बन करके विषय की गम्भीरता को उजागर करने में जान मारते ज़रूर प्रतीत होते हैं लेकिन इस चक्कर में उनका अभिनय थोड़ा अतिअभिनय की तरफ़ भी जाता दिखता है। स्क्रिप्टराईटर ने उत्तरप्रदेश के सवर्ण परिवार का चयन करने में कितनी सूझबूझ दिखाई इस बात का तो पता नहीं लेकिन महज़ एक दिन और एक उदाहरण के साथ समाज को ऐसे बदलते देखना वास्तविकता की कसौटी पर खरा उतरता नहीं दिखता। जैसे जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है कथानक कमज़ोर सा जान पड़ता है। टेबू बेस्ड फ़िल्म में समाज के साथ ज़्यादा प्रयोग नहीं किए जा सकते। कहीं कहीं भारी भरकम संवादों और दृश्यों से फ़िल्म संभलती दिखती है लेकिन हास्य पुट से जो नाटकीय फ़्लेवर बनता है वो विषय की गम्भीरता को जनमानस के ज़ेहन में उतरने से पहले ही क्षीण सा कर देता है। ‘गे’ मैरिज के लिए नाटकीय रूप से मंडप के फेरे लेना एकबारगी किसी रीऐलिटी शो में हँसने के लिए अच्छा है लेकिन एक सामाजिक मामले के तौर पर बहुत मेहनत माँगती है ये फ़िल्म। अफ़सोस आयुशमान ! उम्मीदें ज़्यादा थी तुमसे।
DrGurpreet Singh

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