और कितने सुशांत होंगे शांत


कुछ दिन पहले मैं काफी डिप्रेस था। मन में बुरे बुरे ख़्याल घर कर रहे थे। मरने तक का सोच लिया था मैंने। फ़ेसबुक पर मेरे किए पोस्ट भी इस बात की गवाही दे रहे थे।

हो सकता है आप में से कई लोग इस पोस्ट को पूरा न पढ़ें ,पर मैं आज सब कुछ लिखूँगा। क्योंकि ज़रूरी है कहना, आप सभी को उस असलियत से रूबरू करवाना जो मैंने खुद पर झेली।

Sink कर रहा था मन कहीं डूबता सा। हर ढलती शाम आखरी जान पड़ती है ऐसे समय और हर उगता दिन बेवज़ह नाज़ायज सा। किसी काम में मन नहीं लगता, ज़िंदगी एकदम नीरस। चलते चलते एक ऐसी जगह पर पहुँच जाता है मन, जहाँ से आगे कोई मील का पत्थर हमें नहीं पुकारता। हर वक्त रोने का मन करता है बेवज़ह। बाहरी रूप से एकदम भला चंगा दिख सकता है इंसान। इसीलिए लोग समझते हैं कि अच्छा भला तो था एकदम से क्या हो गया।

सुशांत सिंह राजपूत जो कुछ घण्टों पहले इस दुनिया को अपनी मर्ज़ी से छोड़ गए और उसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों की टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गयी।

"ये नहीं करना था"......"this is not done"......."Wtf"... ...."ये क्यूँ किया"........."please come back".... "can't believe"......."This year is unfortunate"......."please take care your loved ones"......."कह दो कि ये झूठ है".........शेयरिंग ज़रूरी है"........"दर्द बाँटो, बात करो"........"speak to anyone"........."don't give up"........."why???"........."one should never lose the fight"......"काश दुनिया के सामने अपना दुःख बोल देते।"......."तुमने तो हमें inspire किया तुम हमें छोड़ के कैसे जा सकते हो।"........."तुम तो आइडियल थे हमारे, फिर तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?"......

पहली बात तो ये कि जजमेंटल होना बंद कीजिए। आत्महत्या को कायरता और मरे हुए को कमजोर कह कर कोसना बन्द कीजिये। जो गया है आपको नहीं पता कि किन हालातों से गुज़र कर गया है। दुनिया छोड़ना किसी को अच्छा नहीं लगता, अंगुली पर जरा सी चोट लग जाये तो बैंडेज बाँधने की जुगत करते हैं हम, खुद से मरना कोई आसान काम नहीं है। यहाँ मैं आत्महत्या की वकालत नहीं कर रहा लेकिन आत्महत्या करने के बाद उसके कारणों की गम्भीरता समझने के बजाय जो तथाकथित बुद्धिजीविता की चरस बोई जा रही है वो शर्मनाक है।

कोई कह रहा कि "ये कलाजगत होता ही ऐसा है , खर्चे बहुत करते हैं ,फिर तंगी में आत्महत्या कर लेते हैं। आभासी दुनिया के हीरो होते हैं वास्तविकता में नहीं जीते। " उन लोगों से मैं इतना ही कहूँगा कि हर बात में कला जगत के लाइफ़ स्टाइल को जज करके पंचायती ना झाड़ो और आँकड़े उठा कर देखो, इस देश में अमीर से ज्यादा खुदकुशियाँ गरीब करता है, मज़दूर करता है, कर्ज़ में डूबा किसान करता है और आत्महत्या किसी वर्ग विशेष की पूँजी नहीं है।.........इस देश में मेरिट में न आने वाला 10वीं बाहरवीं कक्षा का स्टूडेंट भी आत्महत्या करता है और जेल में बंद एक रेपिस्ट भी।.....आज मुझे सफलता के चरम पर पहुँचे गुरु दत्त और सिल्क स्मिता जैसे कलाकार भी याद आ रहे हैं और जातिवाद की गर्त में गिरा रोहित वेमुला भी।......

खुद के अनुभव से बताऊँ तो साढ़े सात सौ फ़ेसबुक मित्रों की सूची में से Preet Panchal, Reena Borana, नंदिता श्रीवास्तव जैसे 3-4 लोग ही थे जिन्होंने मेरी पोस्ट्स पढ़ कर मुझे खुद आगे आ कर पूछा और सुना। मतलब जब कोई इंसान खुद चिल्ला चिल्ला कर बता रहा हो कि मैं ठीक नहीं तब भी सुनने वालों का आँकड़ा आधे प्रतिशत से भी कम है। Shalini Kashyap ,Meenakshi Chaudhary और सुनीता सनाढ्य पाण्डेय तो मुझे यदा कदा सुनते ही हैं। आभारी हूँ इन सबका कि उस pressure cooker situation से मुझे उबार लिया। क्योंकि तब कोई self help book काम नहीं आती। किसी मोटिवेशनल वीडियो को देखने का मन नहीं करता।.....बस मरने और खुद को इस सब से दूर करने का मन करता है। मैंने अपने जीवन में सैंकड़ों लोगों को सुना है। सैंकड़ों लोगों को ऐसी स्थितियों से निकाल कर अच्छा फील करवाया है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं खुद कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं पड़ूँगा।...... मशहूर हास्य अभिनेता चार्ली चैप्लिन का ये वाक्य याद आ गया "I always like walking in the rain, so no one can see me crying."....

कोई सोच सकता है कि सारी दुनिया को पेट पकड़ कर हँसने के लिए मज़बूर करने वाला इंसान ऐसी मार्मिक बात लिख सकता है?......मैं कोई सत्संग नहीं कर रहा लेकिन बात यही सच है कि जब कोई ऐसी स्थिति से गुजरता है तब उसके पास कोई नहीं होता , बाद में सब चटकारा लेकर सुनने वाले होते हैं.....जो उस वक़्त उसके साथ हो, उसका फ़र्ज़ बनता है कि वो हमेशा उसके साथ रहे जब तक कि वो ठीक न हो जाये।......वरना तो किसी की मौत पर RiP चिपका कर निकल लेना बड़ा आसान होता है।.......आज फ़िल्म जगत के काफी लोग सुशांत को लेकर कह रहे हैं कि " यार मुझे बताया होता....बात तो करता....बात ही नहीं छेड़ी।".....उनसे मैं कहना चाहूँगा कि अगर उसने तुम्हें इनबॉक्स किया भी हो तब कौनसा तुमने ढंग से या सीधे मुँह बात की होगी।.....अक्सर ऐसा होता है कि जो व्यक्ति डिप्रेशन में होता है वो मरने का फैसला चुपचाप नहीं लेता, बहुत आकुलता रहती है मन में, कई दिन तक रह सकती है। मैंने खुद इस छटपटाहट को महसूस किया है। इस छटपटाहट में इंसान एक से ज्यादा लोगों तक अपनी बात रखने के लिए सोशल मीडिया या इनबॉक्स में जा कर मेसज कर सकता है।......सुशांत के इंस्टाग्राम की अंतिम पोस्ट जो 10-12 दिन पहले की है क्या उसे किसी ने देखा??.... क्या उनका ट्विटर देखा??....पुलिस के मुताबिक पिछले छः महीने से वो अवसाद में थे जो अब काफी बढ़ गया था और पिछले ही महीने उनकी बहन भी उनके पास इसीलिए रहने के लिए आई थी।.....मतलब अनहोनी बहुत पहले दस्तक दे चुकी थी।........ सुख बड़ा जल्दी बंटता है, दुख निजी होने के कारण कभी कभी बताया भी नहीं जाता लेकिन जो करीबी होते हैं उनको बार बार संकेत तो मिलते हैं, जिसे वो एकबारगी अनदेखा कर देते हैं।

दूसरी जमात फेसबुक पर बैठे बड़े बड़े तथाकथित counsellers, Healers, mental consultants, psychotherapists, life/ career coaches की है जो यूँ तो अपनी दुकानों से अच्छा खासा कमा रहे हैं। अच्छी बात है उनका व्यवसाय है ये। लेकिन जब भी ऐसे कोई शख़्स ज़िंदगी से हार कर खुद को खत्म करता है तो सब के सब आ जाते हैं अपना ज्ञान बाँचने।..... you should talk, ......you should not be alone,....... one should never lose the fight......अगर वो बता देता अपनी समस्या तो क्या फ़्री में उसकी pycho counselling कर देते???.....बिना पैसे लिए उसको एक अच्छा सा listening session उपलब्ध करवा देते आप लोग?????....तो फिर क्यूँ लगे पड़े हो।

पहली बात तो ये कि ये जो psychoanalyst या pychotherapist नाम के व्यवसाय हैं ये बाजारीकरण और औद्योगिक करण की ही देन हैं।.....काम की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर लोगों का पलायन........शहरीकरण....संयुक्त परिवारों का टूटना....एकल परिवारों या एकाकी जीवन का चलन, .... अकेलापन..... गलाकाट प्रतिस्पर्धा.... महत्वाकांक्षी जीवन..... फिर अवसाद.....फिर बीमारियाँ..... फिर psychotherapist के पास जाना।.....शहर भरते गए और गाँव खाली होते गए........मतलब सब कुछ एक vicious cycle के रूप में हमारी ज़िन्दगियों का हिस्सा बना दिया गया।.......जिसे हमने अवसरवाद या विकास की संज्ञा दी।

मेरा इन बुद्धिजीवी लाइफ़ गाइडों से इतना ही अनुरोध है कि अगर किसी ने अपनी ज़िंदगी से परेशान होकर ऐसे आत्महत्या की है तो इतनी कृपा बख्श दो कि अपने तथाकथित ज्ञान की बवासीर बाँटने और उस शख़्स को कायर कहने की बजाय उसकी मजबूरी समझो और अगर सहानुभूति देनी है तो उसके परिवार वालों को दो क्योंकि वो तो अब इस दुनिया से चला गया है और एक बार फिर कोई इंसान सबको बता गया है कि अपनी लड़ाई खुद को ही लड़नी पड़ती है।......अपना दुःख सिर्फ अपना होता है।....

इंसान जीए चाहे सबकी खुशी के लिए, लेकिन खुद मरना हो तो किसी के लिए नहीं, सिर्फ़ खुद के दुःख के कारण मरता है।

DrGurpreet Singh/ कल की फ़ेसबुक पोस्ट से 

Comments

Anonymous said…
आपका लेख पढ़ा वास्तव में कभी-कभी उपदेशों का कोई औचित्य नहीं होता है। शब्द दर शब्द संवेदनशीलता से भीगा हुआ है। एक कमी लगी कि यदि इस दृष्टिकोण से सोचा जाये तो इस गला काट प्रतिस्पर्धा के युग में हर दूसरे व्यक्ति को आत्महत्या कर लेनी चाहिए। इसको उचित ठहराने वाले यूं भी उसके पास ढेरों कारण होंगे। लेकिन कितना भी अवसादपूर्ण वातावरण हो हम उस सकारात्मक ता को ढूंढने के लिए जिजीविषा की डोर थामे रहना ही श्रेष्ठ बताते हैं। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि किसी भी कार्य को करने के कुछ नियम बनाये जाते हैं क्या सब उस पर चलते हैं? नहीं। यदि नियम हो ही ना तो दिशा हीनता होगी। जब कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कही जाती है जो उसके लिए अधिकृत है तो उसके कहे का प्रभाव पड़ने की सम्भावना तुलनात्मक रुप से अधिक होती है। शेष सभी अपनी मानसिक क्षमता के आधीन ही कार्य करते हैं। नकारात्मक संदेश किसी और को भी इस मुहाने तक ला सकता है।
Anonymous said…
सच कहा.. अपनी लड़ाई सच में खुद को ही लड़नी पड़ती है।

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