हेडमास्टर मग्गर सिंह जी के साथ सुनहरी दोपहर

मेरी दादी के चचेरे भाई 'मग्गर सिंह' (बाबा जी) के साथ सादुलशहर में बिताई आज 19 जून 2020 की दोपहर।

मुझे बचपन से ही बुज़ुर्ग और बच्चे बहुत लुभाते हैं उनसे बात करना ,उनके बारे में जानना बहुत अच्छा लगता है। आज सादुलशहर जाने का मौका मिला और एक बार फिर मैं अपनी जड़ों से जुड़ गया।मेरी दादी प्रकाश कौर के चचेरे भाई मग्गर सिंह (बाबा जी) से मिलने का मौका मिला और मैं उनके साथ बात करते हुए 1935 में चला गया। जी हाँ, 1935 में ही बाबा मग्गर सिंह जी का जन्म चक नूरसर , तहसील चिश्तियाँ, जिला बहावलनगर, पंजाब प्रांत (अविभाजित भारत) में हुआ था। बताने लगे  भारतीय तक़सीम के समय इनकी उम्र कोई 12 साल रही होगी जब ये अपने परिवार के साथ  बैलगाड़ी पर नवनिर्मित पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़ हिंदुस्तान के राजस्थान में आ गए और यहीं श्रीगंगानगर के खालसा स्कूल से आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की। फिर प्राइवेट मैट्रिक की परीक्षा पास करके बेसिक ट्रेनिंग (बी एस टी सी) का कोर्स कर लिया। 1960 में आप राजस्थान सरकार के अंतर्गत प्राईमरी स्कूल में अध्यापक के पद पर कार्यरत हुए और अंततः 1995 में हेडमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। मेरी उत्सुकता देख बाबा बताने लगे कि कैसे तक़सीम के समय एकदम से उस मिट्टी को छोड़ना पड़ा जिस नूरसर की मिट्टी में 12 साल की उम्र तक खुद्दो ख़ूनडी खेलते थे। (खुद्दो -कपड़े की बनाई गेंद, ख़ूनडी -कीक़र के पेड़ से तोड़ कर मरोड़ी हुई छड़ी जिसे हॉकी की तरह इस्तेमाल किया जाता था), कबड्डी खेलते थे, हिन्दू मुसलमान का कोई फ़र्क नहीं था, घर पर बैलों की जोड़ी, गाय, भैंस, बकरियों समेत बारह-पंद्रह पशु डंगर थे, खेत-खलिहान थे.... उपजाऊ जमीन थी.....कपास , गेंहूँ, सरसों की अच्छी फसल होती थी.....बताते बताते उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई और मैं उनके साथ उनके दौर में विचरता चला गया......आगे बताने लगे कि जब उन्हें पता चला कि ये देश मुसलमानों के लिए है और कोई नया देश हिंदुस्तान बना है जिसमें सिखों को जाना होगा तो कुछ कपड़ा लत्ता गाड़ी पर लाद कर बैल जोड़ लिए गए।..... सुनते हुए मैं कल्पना करने लगा उन बैलों की, वही बैल जो कभी उधर की धरती को सींचते थे अब नफ़रत की उस लकीर को पार करने पर मज़बूर हुए थे जो चंद हुक्मरानों ने लाखों लोगों की क़िस्मत में खींच दी थी।......बाबा बताने लगे कि इनका एक भाई जो पिछले काफ़िले में आ रहा था, कट्टरपंथियों (दंगाईयों) की बलि चढ़ गया। हुआ यूँ कि परिवार की कुछ औरतों को भूख लगी और वो उन्हें चने भुना कर लाने का बोल कर गया तो कुछ मुसलमानों की भीड़ ने उसका पीछा किया और उनसे बचने के लिए सादकी नहर में कूद गया। बाबा मग्गर जी बताने लगे कि उस समय आज की तरह कोई मोबाईल फोन तो थे नहीं ,बस किसी जगह से भाई की खबर मिली कि ऐसा हुआ कि जब वो नहर में कूदा तो एकबार तो पानी के वेग से जलसतह पर आ गया लेकिन सिर की पगड़ी गीली होने की वजह से उस में छिपाए हुए पैसे और कीमती सामान के वजन से दुबारा डूब ही गया।....ये किस्सा मेरी दादी की भरी आवाज़ मैं मैंने कई बार सुना था। साथ ही उनके नूरसर के ही एक भले मुसलमान भाई झण्डू का भी किस्सा जिसने दादी के सबसे बड़े भाई को सकुशल सरहद पार करवाई थी।.....बैलों की उस जोड़ी को मरते दम तक मेरे घर के बुजुर्गों ने प्यार दिया। कभी बीमार पड़ते तो शहर से डॉक्टर ले कर जाते और उनकी सेवा करते। बाबाजी बताने लगे कि उन बैलों के भरोसे ही हम इतना सफ़र काट आये और बैलों ने हमारी इधर हिंदुस्तान आ कर भी बड़ी सेवा की।......बाबा जी मेरे सवालों के जवाब उसी तन्मयता से देते गए जिस तन्मयता से उन्होंने जुलाई अगस्त 1947 के दिन झेले, लेकिन उफ़्फ़ तक न की। मेहनत की, घर बनाया, सरकारी नौकरी की, इज़्ज़त पाई और अब पेंशन के साथ शुक्रगुज़ार ज़िंदगी जी रहे हैं।..... मेरी तरह इन्हें भी फ़ोटो खिंचवाने का बड़ा शौक है, जब मैंने कहा तो झटपट तैयार हो, पगड़ी सजाई और मूँछों पर ताव दे कर फ़ोटो करवा कर बड़े खुश हुए।..... ऐसे ही जीती रहें ये बेशक़ीमती रूहें जिनकी सोहबत में मुझे अपना आप भी बहुत बड़ा सा लगता है।






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