मेरे दादाजी - सरदार अमर सिंह जी
आज मेरे दादाजी सरदार अमर सिंह जी का जन्मदिन है और आज मन कर रहा है आप सब से उनके बारे में बहुत कुछ साझा करने का। उन्हें हम प्यार से पापाजी ही बुलाते थे। उनका जन्म 20 जून 1925 को सरदार महँगा सिंह जी के घर पंजाब के फिरोज़पुर जिले के मुद्दकी गाँव में हुआ। बचपन में एक दो बार दादाजी हमें वहाँ अपने गाँव लेकर भी गए थे। किसी रिश्तेदार की शादी थी और हमें उत्साह था छुट्टी और दादाजी के जन्मस्थान को देखने का। हम बच्चे जब प्यार से दादाजी से पूछते कि ये मुद्दकी कौनसी जगह है तो वो बड़ी रौ में उत्तर देते, वही ऐतिहासिक मुद्दकी गांव जहाँ पर 1845 में सिक्खों और अंग्रेजों के बीच ‘मुद्दकी की जंग’ लड़ी गई थी। शहीदों की याद में अब गुरुद्वारा कत्लगढ़ उसी मैदान-ए-जंग की जगह पर ही बना हुआ है जहाँ हम घूम कर आये और खूब सी यादें स्मृतिपटल की पोटली में भर लाये।
बीकानेर रियासत के राजा गंगा सिंह बहादुर ने बीकानेर के विस्तार और समृद्धि के लिए पश्चिम विस्तार नीति के तहत बहावलनगर जिले के अरक्षित इलाके को एक शहर के रूप में बसाने का सोचा। सतलुज के पानी को हेड कैनाल बना कर लाने का कार्य शुरू हुआ। 1927 में वायसरॉय लॉर्ड इरविन के हस्ताक्षर से जल सन्धि और सतलुज के पानी को कैनाल रूप में लाने का कार्य सम्पन्न होते ही शहर बस गया। नाम भी उस भागीरथ के नाम पर ही पड़ा - श्रीगंगानगर।
पड़दादाजी कीर्तन के बहाने इधर आये और फिर लौट कर मुद्दकी गए तो यहाँ के लोग वापिस बुलाने आ गए। अतः दादाजी अपने पिता स.महँगा सिंह जी और बड़े भाई के साथ 4-5 साल की उम्र में ही श्रीगंगानगर आ गए। पाँचवीं तक की पढ़ाई ही की थी कि 1936 में उनके पिता मात्र 48 साल की उम्र में ही इस दुनिया को अलविदा कह गए। निमोनिया सच में लाइलाज बीमारी थी, इसलिए महज़ 11 साल की उम्र में पिता का साया उनके सर से उठ गया। तीन साल बाद 1939 में महज़ 14 साल की उम्र में उनकी शादी नूरपुर चिश्तियाँ की प्रकाश कौर के साथ हो गई। मेरी दादी प्रकाश कौर तब 12 साल की ही थी। पिता के चले जाने के बाद दादाजी को अपने से 14 साल बड़े अपने भाई का ही सहारा था। पढ़ाई पाँचवीं करके छूट गई थी। एजेंसी ली और साईकिलों की दुकान खोल ली। किराये पर साईकिल देना और बेचना शुरू कर दिया। काम ज्यादा साल नहीं चल सका, घाटा खाया और बन्द करना पड़ा।फिर बड़े भाई की सोहबत में दर्ज़ी का काम सीखा और अपना काम शुरू कर दिया। धीरे धीरे दुकान किराये पर ली और कारीगर भी बिठा लिए। कई लोगों को कारीगर बनाया।
1946 में ब्यास राधास्वामी डेरे से जुड़ गए और सादगी भरे जीवन में सब्र कर लिया। 1960 में भाई से अलग हुए और खुद का मकान खरीदा 10 हज़ार रुपये में। लेकिन 10 हज़ार भी तब बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। कर्ज़ा उठाया और धीरे धीरे कमा कर पैसे चुका दिए।
पैसे की तंगी देखी पर सबकी मदद की। कहा करते थे कोई भूखा हमारी चौखट से निराश नहीं जाना चाहिए।
बचपन की स्मृतियों में जाऊँ तो याद आता है मेरे दादाजी का जीवन सादगी में ही गुजरा। क्रीम रंग की मलमल की पगड़ी बाँधा करते थे और कुर्ता या कमीज़ पजामा। हाथ पर वही चाबी वाली घड़ी। जेब वाली सूती गाँधी बनियान। खाने के मामले में भी गाँधी जैसे ही थे। थोड़ा ही खाते थे लेकिन जो खाते थे बड़ा सोच समझ कर खाते थे। मैं याद करता हूँ वो कहा करते थे कि खाने की चीज़ ना तो ज्यादा गर्म हो और ना ज्यादा ठंडी। बस इतनी सी हो कि उल्टे हाथ (हाथ की
ऊपरी सतह) से छूई जा सके। हाँ लेकिन उन्हें सूजी का हलवा बहुत पसंद था। कभी कोई महँगी चीज़ खरीद कर नहीं
पहनी। कभी किसी दिखावे में यकीन नहीं रखा। सच बोलने और ईमानदार रहने की ही शिक्षा दी। तंगी देखी थी इसलिए पैसे का महत्त्व समझते थे और हमें भी सिखाया करते थे।
सुबह उठ कर त्रिफला के पानी से आँखें धोते, इसबगोल खाते, नीम या कीक़र की दातुन करते ,नंगे पैर सैर करते, तुलसी के पत्ते चबाते, योग करते, मटके का पानी पीते। साईकल तो 75 साल की उम्र तक चलाई उन्होंने। आँखों की पुतलियों पर मोम लगाया करते थे। मुझे याद है जब उन्हें पहली बार चश्मा लगा तब उनकी उम्र कोई 74-75 थी। कहते थे सूरज की तरफ नहीं देखना चाहिए आँखें कमजोर होती हैं, चाँद ठंडा होता है उसकी तरफ देखने से आँखें रौशन होती हैं।
मुझे याद आ रही हैं वो गर्मी की दोपहरें जब स्कूल से आ कर खाना खा कर सबसे पहले मैं और मेरी बहन उनके पास जा कर बैठ जाते। स्कूल के बारे में उन्हें बताते। हालाँकि दादाजी पाँचवीं कक्षा ही पास थे पर उर्दू के बहुत अच्छे जानकार थे। कहा करते थे जो composition, preposition, vocabulary तुम आठवीं दसवीं में पढ़ रहे हो ये हमें अंग्रेजों के जमाने में तीसरी चौथी में पढ़ा देते थे। सच बताऊँ उस समय बड़ा सुकून मिलता था उनके बड़े कद को देख कर। अंग्रेजी में उनकी गिनी चुनी कहानियों और मुहावरों को बार बार सुन कर भी बड़ा मज़ा आता था। मेरी कॉपी पर उर्दू में कुछ न कुछ लिखा करते, मेरा नाम तो मैं अक्सर उनसे लिखवाया करता था। भीषण गर्मी के उन दिनों में जब सारा शहर सो रहा होता हम दादा दादी के पास बैठे होते। फिर बाहर मोहल्ले में जब खोए वाली कुल्फी वाला (आज़ाद कुल्फी या दुर्गा कुल्फी) घण्टी बजाता तो दादाजी कह देते "जाओ कुल्फी वाले नू रोको।"....हम दौड़े जाते और कुल्फी वाले को रोकते। आ कर देखते तो दादाजी प्लास्टिक की सिली हुई थैली में से सिक्के निकाल कर हमें देते। वो थैली सिक्कों के लिए खास तौर पर खुद तैयार की थी उन्होंने।
वाह रे बचपन! मिलती सबसे छोटी वाली कुल्फी थी , लेकिन क्या चीज़ थी न उस एक-दो रुपये की टपकती कुल्फी में जिसके ऊपर से आजकल की सारी ब्रांडेड चीज़ें कुर्बान की जा सकती हैं। हम होमवर्क करके फिर दादाजी के कमरे में घुस जाते। आज दादी की नज़र बचा कर मुझे पैर दबाने का इशारा करते दादाजी भी याद आ रहे हैं और मुझसे प्रेमचंद की कहानियाँ सुन कर रोते हुए दादाजी भी। पैर दबाने का इनाम ये मिलता था कि थोड़ी देर बाद मैं उनके साथ उनकी उस मुलायम सी चारपाई पर लेट जाता था। उनको कस कर गले लगाना.....वो खुशबू.....वो पँखे की सादी हवा.....उनका ठंडा कमरा.....कभी तंग नहीं होते थे, उन्हें जैसे हमें पा कर चाव सा चढ़ जाता था और हम सोचते थे कि सब लोग ऐसे ही दादा
दादी के साथ प्यार करते होंगे। आज उनके जाने के बाद एहसास होता है कि हर किसी की किस्मत में ये दौलत नहीं होती जो हमने भोगी।.....दादाजी की वजह से ही घर में मांस शराब सिगरेट नाम की कोई चिड़िया देखने सुनने को नहीं मिली। प्रकृति प्रेमी थे, पौधों को पानी देना, सींचना उन्हें अच्छा लगता था। हमसे विज्ञान की बातें सुन कर अचंभित भी हुआ करते थे। रिश्तेदारों में भी अपनी सादगी के कारण लोकप्रिय थे। शाम को घड़े वाली कुल्फी वाला सर पर घड़ा रख कर खोए वाली कुल्फी बेचने आता तो मज़ाक में कह देते "दुपहरे ता खाई सी कुल्फ़ी " और फिर दिला भी देते। हम लोग तब सोचते ये इतने कंजूस भी नहीं लगते फिर ऐसे क्यूँ बोलते हैं।.....मोहल्ले में राशन की दुकान पर उनके साथ हम राशन लेने सिर्फ इसलिए जाते कि जो अठन्नी चवन्नी बचेगी उसकी मीठी गोलियाँ खायेंगे।.....टी वी -फ़िल्मों में कुछ खास रुझान नहीं था उनका, बस कभी कभी गुरु दत्त को बड़ा याद करते और कहते कि उसकी जिंदगी तो दुःखों को प्ले करते करते दुःखों में ही बीत गई।......बताया करते कि हमारे जमाने में लोग ड्रामे देखने जाया करते थे, दीए की रोशनी में फ़टाफ़ट खाना बन जाता और खा कर निकल पड़ते देखने।
राजनैतिक बातों में विशेष रूचि लेते और अखबार पढ़ा करते। कभी कभी मुझसे अखबार पढ़वाया करते। कोई शिक्षाप्रद कहानी होती तो कहते आराम से मेरे पास बैठ के ऊँची आवाज़ में पढ़ कर सुना। खेलों के बारे में बताया करते कि कबड्डी या हॉकी खेला करते थे। हॉकी के लिए वही कपड़े की गेंद और हॉकी स्टिक की जगह कीक़र के पेड़ की कोई मुड़ी हुई टहनी तोड़ कर छड़ी की तरह इस्तेमाल कर लिया करते थे। कहा करते थे कि अंग्रेजों के जमाने में जो लैम्प लगे होते थे उनकी रौशनी में पढ़ा करते थे और हम उनसे पूछा करते कि अंग्रेज कैसे होते थे, कैसे दिखते थे, क्या बोलते थे, क्या खाते थे। मेरी बहन मीनू पढ़ाई में अव्वल रहती थी इसलिए दादा दादी के साथ मेरा ज्यादा समय बिताना कभी कभी उसे मेरी कामचोरी जान पड़ता था। पर मैं अपने नादान सवालों की उस काल्पनिक सी दुनिया में बहुत खुश रहता था। दादाजी को सुन कर मेरा मन होता कि काश मैं भी इनके काल में पैदा हुआ होता। बालमन शायद ऐसा ही होता है, बचपन की चमकती आँखों को हर चीज़ सुंदर चमकती सोना ही दिखाई देती है। हमें जरा सी चोट लग जाती या बुखार हो जाता , दादा दादी सो नहीं पाते बार बार हमारी ख़बर लेते।
फ़ाइनल रिज़ल्ट आने के बाद हम दादा दादी को दिखाते। दादाजी बड़े ध्यान से एक एक विषय के अंक देखते जाते और मुँह से बस एक ही शब्द निकलता
"वाह भई वाह !"..... कालांतर में हम बड़े हुए कॉलेजों में दाखिले लिए, मुझे याद है वो दिन जब पहली बार मैंने खुद
आसमानी रंग की पगड़ी बाँध कर उनको दिखाई, बड़े खुश हुए। कहते "बोहत सोहणा लगदा पया है".... कभी कभी मेरी कद काठी देख कर बोल देते थे...." तैनूं मिल्ट्री च होणा चाहिदा सी,..... लेफ्टिनेंट गुरप्रीत सिंह, साडा लेफ्टिनेंट गुरप्रीत सिंह!!!!।".....और मैं उनकी ये बात सुन कर बस हँस देता था।
मैंने 2007 में पगड़ी बांधनी शुरू की, आज करीब 30-35 शेड्स की पगड़ियाँ हैं मेरे पास, लेकिन शुरुआती दौर में बस काला, नीला या किसी गहरे रंग की पगड़ियाँ ही पहनता था। रंगों से थोड़ी झिझक सी ही थी। दादी कहा करती थी ये क्या गहरे रंग। काली पगड़ी में मुझे देख वो बोल पड़ते रावण की सेना आ गई। आज जब लोग मेरी पगड़ियों के अलग अलग रंगों और शेड्स की तारीफ़ करते हैं तो सोच में पड़ जाता हूँ कि शायद ये सपना मेरे दादा दादी की आँखों ने बहुत पहले देख लिया था लेकिन मुझे इतने रंगों में देखना उनकी आँखों के नसीब में नहीं था। यही है मानव मन, कितना ही पा लें , कुछ न कुछ 'काश' रह ही जाता है।
दादाजी अमर सिंह जी 86 साल की उम्र भोग कर 05 नवंबर 2011 में हमें छोड़ गए। लेकिन यादों की जो खान मेरे अंदर छोड़ गए वो सारी उम्र उनकी याद में हीरे मोतियों से अक्षर पैदा करती 'अमर' ही रहेगी। आज उनका जन्मदिन है , आज सच में बहुत याद आ रहे हैं वो। जन्मदिन मुबारक हो पापाजी।
~DrGurpreet Singh






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