‘अभिमान’ की स्वाभिमानी ‘जया’
आज Father’s day पर संयोगवश ‘मेल ईगो‘ पर बनी ख़ूबसूरत फ़िल्म ‘अभिमान’ (1973) देखी। इस फ़िल्म के गाने मुझे बहुत पहले से ही पसंद थे। कहानी भी सुन रखी थी लेकिन शुरू से अंत तक देखने का मौक़ा आज मिल ही गया। ..... इस फ़िल्म के बारे कुछ कहने की बजाय मैं बस ‘जया भादुरी’ जी की बात करूँगा। हाँ ‘भादुरी’....क्यूँकि बचपन से आज तक मैं उनको बच्चन जी के कारण नहीं अपितु उनकी शख़्सियत और अभिनय के कारण तवज्जो देता आया हूँ। पुरानी अभिनेत्रियों में मेरा क्रश रही हैं जया। .....उनका सादगी भरा चेहरा कुछ ना बोले भी उदासी में मुँह फेर ले या एकदम से प्रेम अनुरागित हो नायक को तक ले तो कलेजा आज भी मुँह को आ जाता है।.....याद है मुझे ‘मिली’ फ़िल्म देखते समय मैं बारह पंद्रह बार रोया था। और इसी क्रम में ‘परिचय’ ‘चुपके चुपके’ और ‘सिलसिला’ फ़िल्में देख डाली थी। उनकी सादगी मुझे आज भी इतना परेशान कर देती है कि कोई इतना सरल कैसे हो सकता है। सोच रहा हूँ एक शांत निर्मल नदी सरीखी आँखों से तकती उनकी शख़्सियत जब सादगी से फ़िल्म के संवाद बोलती होगी तो डायरेक्टर टीम ‘कट’ बोलना ही भूल जाती होगी। है ना? कितना मुश्किल रहा होगा ना अपने स्टारडम के चरम पर अभिमान जैसे फ़िल्म में vice versa किरदार को जी कर निभाना....जया के अलावा कोई ना कर पाता शायद।
DrGurpreet Singh





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