तेरा जाना

कभी कभी
मुझे लगता है
मेरे अंदर,
इतनी बेइंतहा
मुहब्बत भरी हुई है
कि इसका ग़ुबार
मेरी छाती में धड़कते
दिल को ले डूबेगा।

मेरी साँसों में
इतनी उथल पुथल
मचा देगा
कि मुझे,
तेरा यूँ चले जाना
जीवन और मृत्यु के
बीच का
इक महीन सा
वो रेशमी क्षण लगेगा
जो मेरी इकतरफ़ा,
अनकही ,ज़ख़्मी
मुहब्बत ने
तेरे जाने की
बेबसी में
बुना होगा।

और अब
मुझे ये भी लगता है
कि मेरी मुहब्बत का
ये पागल सा
रेशमी कीड़ा
सारी उम्र
सुर्ख़ नज़्मों के
धागे बुनता रहेगा।

और ज़ख़्मों की
पैरवी करती
मेरी ये ज़िंदगी
तुझे ना रोक पाने की
बेबसी का मातम
मनाती रहेगी।

धागा मेरी अंगुलियों पर
लिपटता सुर्ख़ से
स्याह हो जाएगा
रंग मुहब्बत का भी
यूँ
गहरा और गहरा
हो जाएगा।

बस अब चाहता हूँ
कि तेरे बग़ैर
तमतमाता
ये यौवन,
किसी भी सूरत में
काल-गर्त
ना हो,


ज़िंदगी की किसी
तपती दोपहर
ये आसमा
मेरे हिस्से की
सारी धूप
एक घूँट में ही पी ले।
फिर
काल गर्जना के साथ
स्याह मेघ तले
‘प्रीत’ अपने घर चला जाएगा।

DrGurpreet Singh

Comments

Anonymous said…
Jab dard hadd se bad jaye to samjh lo zindagi bohot kuch sikhane wali hai

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