दोस्ती का दिन- You can win the battle, but the War.
अंग्रेज़ी की एक कहावत है
“You can win the battle, but you will lose the war. “
रिश्तों की बात करूँ तो ये पंक्ति सच में चरितार्थ होती है।हम जिस परिवेश में जन्म लेते हैं, पलते हैं, बढ़ते हैं और एक आत्मनिर्भर इंसान बनते हैं, वो परिवेश ना केवल हमारी परवरिश अपितु बाध्यता का भी गवाह रहा होता है। यह एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया है।
इसके इतर हमारे मस्तिष्क का एक वो कोना भी होता है जो इन सब बातों के मुख़्तलिफ़ कुछ अस्वाभाविक सिग्नलस/संकेतों को ग्रहण करने की इच्छा जताता प्रतीत होता है। हम चाहे जिस भी पृष्ठभूमि से हों लेकिन मस्तिष्क का यह कोना कुछ नावाक़िफ़ चीज़ों को ग्रहण करने के लिए ख़ाली रहता है। इसीलिए जब हम कुछ नया देखते, पढ़ते, महसूस करते या फिर लिखते हैं तो हमारे अवचेतन मन में उस विचार, उस बात, उस प्रेरणा के लिए आसक्ति सी उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रक्रिया को मैं बौद्धिक विकास का नाम दूँगा, जब आंतरिक और बाह्य विसंगतियों में हम विश्लेषण करना शुरू कर देते हैं। यह भी एक सतत प्रक्रिया है और एक इंसान मरते दम तक इस प्रक्रिया का साक्षी रहता है, मौत अवसान नहीं, इस प्रक्रिया का अवरोध है।
इसी प्रक्रिया में हम एक विचारधारा को वैचारिक या व्यावहारिक तौर पर जीने लगते हैं । एक नए विचार या सोच को व्यवहार तक आने में कई बार कुछ पीढ़ियाँ भी गुज़र जाती हैं। हम रोज़ नए लोगों से मिलते हैं। जब सतही बातों से ऊपर उठ कर किसी विषय पर बातचीत करते हुए अपने तर्क रखते हैं, तो कभी कभी हम ख़ुद ही भूल जाते हैं कि जिस विचार या तर्क के हम पैरोकार बने बैठे हैं, क्या हम स्वयं उसे जीते हैं? क्या जिस विचारधारा की पताका फहराये हम रणबाँकुरे कहलाने को लालायित हैं ,क्या कभी उस रण-क्षेत्र की ज़मीनी सच्चाई से हम वाक़िफ़ भी हैं?
लोगों के साथ ऐसा अक्सर होता है कि कभी परिवारजन , कभी कोई अज़ीज़ मित्र तो कभी अपने हमसफ़र के साथ ईगोवश किसी तर्क का बहसबाजी की शक्ल अख़्तियार कर कुतर्क बनना आम सी बात हो जाती है। इसे दूसरे शब्दों में “ईगो सैटिस्फ़ाई” करना भी कह सकते हैं। लेकिन इस बात के दूरगामी प्रभाव क्या पड़ सकते हैं ये बात तो इस अंग्रेज़ी की कहावत में बख़ूबी बयान की ही गई है कि आप इस तरह की बहस में एक ,दो ,चार ,दस लड़ाइयाँ भले ही जीत जाओ लेकिन आप वास्तव में उस रिश्ते को गँवा बैठते हो।
रिश्तों की विडम्बना देखिए, किसी इंसान को हराने की ज़िद में आप उस इंसान को ही हार जाते हो।
आज मित्रता दिवस है शायद लेकिन सच कहूँ तो ज़रूरी नहीं कि आपका मित्र या साथी आपके विचारों से इत्तेफ़ाक रखता हो इसलिए किसी विचारधारा के अधीन किसी सुंदर रिश्ते को गँवाने की भूल ना करें।
DrGurpreet Singh
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