आगरा वाली आशु - इक मनचाहा रिश्ता
साल 2019... और ज़िंदगी के कैलेंडर पर तवारीख थी 28 जून।
जब फ़ेसबुक की असहज दुनिया में सहजता से मेरा मित्र आवेदन स्वीकार हुआ था
सामने शख्स भी बहुत खास .... Ashu Chaudhary और शायद रूह की वाबस्तगी ही थी कि लगा ही नहीं कि हम फ़ेस्बुक पर ही मिले।
प्यारी दुलारी दोस्त जितनी ज़हीन चित्रकार और कलाप्रेमी है उतनी ही सहज और सुलझी हुई इंसान भी। ये आशु ही है जो बड़ी बेबाकी से कहती है
"आत्मीयता अंतरंगता में न बदले तो संबंध दीर्घजीवी होते हैं। ऐसा मेरा मानना है । इसका दायित्व दोनों पर होता है दोस्त।.....
ये साफगोई शुरू में अटपटी ज़रूर लगती है
लेकिन ये बहुत मजबूत नींव है दोस्ती की"
और इस शैदाई ने उसी रौ में कह दिया था "आपकी परिपक्वता की क़द्र करता हूँ ...साफ़गोई मुझे भी पसंद है"
वो बड़प्पन नहीं बराबरी चाहती है इसीलिए दोस्ती में जी हुजूरी से परहेज़ भी खाती है। ....
बेबाकी से कह देती है....आप मुझे आशु या अर्शी बोल सकते हैं...हम दोस्त हैं बड़े या छोटे नहीं....विचारों की उम्र दोस्ती के लिए काफ़ी होती है दोस्त....
और फिर एक दिन लोकल ट्रेन में सफर करते हुए अपने कुछ स्केचेज़ इन्हें भेजे तो उसी प्यारेपन से मुझसे पूछ बैठी .....तारीफ़ ही करूँ या कमी भी बताऊं...या दोनों?
मैंने कहा ....आप आर्टिस्ट हो तो कुछ भी कह सकते हो।
सामने से जवाब आया ....आपमें कला की बेहद संभावनाएं हैं! हूबहू जेस्चर्स रचते हैं आप!
बेहद करीब जाते हैं ऑब्जेक्ट के
सब्जेक्ट बना देने तक....लेकिन आपके स्केचेज़ में एक जल्दबाजी , और अधपकापन है। जो कि कहीं न कहीं दिखाता है की आप एक झलक आजाने पर ही संतुष्ट होजाते हैं और फिर उसे जल्दबाज़ी में पूरा करते हैं.....सो ये आपकी कला की नही आपकी कमी है
"ये सभी १०-१२ मिनट में बनाए हैं....मेरी ज़िंदगी ही ऐसी है...यायावर"...मैंने खिसिया कर पतली गली का रास्ता नापना चाहा तो बोल उठी
"बस यही ...थोड़ा और समय दीजिये फिर देखियेगा ...आपको एक अलग सुकूँ देगी आपकी आर्ट....यायावरी भी तसल्ली से करिये प्रीत....
आनंद पाएंगे ...जल्दबाज़ी में नहीं
बधाई आपको बहुत बहुत । सुंदर रचते हैं ।
और एक बात । मैं आजतक आपको हल्के में ही लेती थी क्यों कि मैं ज्यादा चैटिंग नहीं करती। लेकिन शुक्रिया की आपने अपनी विनम्रता से एक कलाकार से मिलवाया"
और फ़िर अगले ही दिन 06 अगस्त 2019 को एक 4 पंक्तियों का छोटा सा ख़त तुम्हें डाक द्वारा भेज मेरा रोम रोम खिल उठा था। मैं चिट्ठियाँ लिखने में यकीं रखता हूँ और सामने चिट्ठियाँ पढ़ने वाला भी मिल जाये तो क्या कहने। हाँ एक मलाल ज़रूर रहता है मुझे कि लोग लाख तोहफ़े भेज देते हैं लेकिन चिट्ठी का जवाब लिख भेजने में बड़े आलसी रहते हैं।.....आशु से भी मेरी ये शिकायत बदस्तूर जारी है। मेरी चिट्ठियों के जवाब में बस मुस्कुरा देती है।
ये आशु ही है जो मुझसे मेरी पगड़ी माँग कर सर पर सजाती है और गिटार से धुन निकाल कर माहौल को सूफी कर देती है।
12 जनवरी 2020 के दिन जब हम पहली बार दिल्ली में रूबरू हुए और विश्व पुस्तक मेला घूमने गए तो दिल्ली के गाँधी सदन में टहलते हुए यूँ ही कह दिया ...."तुम बड़ी कलाकार हो ना....चलो बनाओ मेरे हाथ पर कुछ"....और तुमने भी उसी सहजता से मेरे बढाये हुए हाथ को थाम पेन से कुछ रच दिया और नीचे अपना नाम लिख जैसे समय की सुईयां रोक दी।.....जानता हूँ दोस्ती की नींव दिनबदिन गहराती जाती है और जब भी जैसा भी कुछ साझा करना हो ,तुम्हारे साथ साझा कर लेता हूँ लेकिन उसकी एक खास वजह भी है...... तुम इतनी अच्छी और सहज दोस्त हो आशु कि तुममें मैं मेरी ज़िंदगी की सभी औरतों यानि बहन , माँ, मित्र , प्रेमिका के रिश्तों का समावेश सा पाता हूँ। इसलिए फ़ोन पर कुछ भी बताने से कतराता नहीं हूँ।.....तुम भी जब डाँट भी लगानी हो , बेझिझक लगा देती हो। तुम्हारा होना ज़िन्दगी में एक सम्बल है कि कोई हर वक़्त ज़ेहनी तौर पर साथ है.....आज तुम्हारा जन्मदिन है इसलिए इतना सब लिखने से ख़ुद को रोक नहीं सका।..... चाहता हूँ ज़िन्दगी तुम्हें यूँ ही प्रेम से गले लगाती रहे और हमेशा खुशी से खिलखिलाती रहो।
Love you alot ❤️❤️😘😘









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