‘पाखंडी 'फ़ीनिक्स'
हर रात
मेरा ठंडा पड़ चुका शरीर,
सुबह तक
जब स्वप्नलोक की यात्रा से
लौटता है।
मैं सो कर नहीं,
जी कर उठता हूँ......
और तुम हो
कि हर बार हँस कर
कह देती हो....... ....- पाखंडी 'फ़ीनिक्स'।
और मैं तुम्हारे इस
उपहास पर भी इतरा जाता हूँ।
.....जानता हूँ .......
इस बात में ही
हमारा रिश्ता छिपा है।
©डॉ.गुरप्रीत सिंह

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