पूजा- अर्चना अरदास और धर्म स्वरूप , भारत के परिप्रेक्ष्य में।

 आराधना , पूजा, अरदास या उस्तत किसी भी लफ्ज़ में उस अलौकिक शक्ति(जो किसी ने आज तक न देखी न महसूस  की) के सामने गिड़गिड़ाना या विनती करना आध्यात्म का अंग रहा है, वही आध्यात्म जो तथाकथित धर्म की दुकानों और उनके सिपहसालारों ने नियमबद्ध करके धर्म का डरावा दे कर हमारे सिर पर मढ़ा।.......किसी शिशु के पैदा होते ही उसके मस्तिष्क के विकसित होने से पहले ही उसे .....बेटा जय बोलो अंकल को, बेटा सतश्रीअकाल बोलो, बेटा ये बोलो बेटा वो बोलो,....करके उसको धर्म की शिक्षा के नाम पर डरावे वाली चीज़ें उसके हार्डवेयर में इंस्टाल करके दे देते हैं।.......


बचपन में अगर वो कुछ तार्किक सवाल करे भी तो बस ये कह कर चुप करवा दिया जाता है, अरे बेटा ! ऐसा नहीं बोलते, पाप लगेगा, फ़ेल हो जाओगे परीक्षा में...चलो सॉरी बोलो रब जी को ।....


फिर जब कुछ सालों बाद उसका मन किसी तरह धर्म के ट्रैक पर आ जाता है तो फ़िर उसे प्यार करना बताया जाता है कि.... "बेटा ! सुनो! ...जैसा कि अब तुम अरदास करते हो, ...उस अलौकिक शक्ति को मस्का लगाते हो, उसको रोज़ सुबह उठ कर बोलते हो कि बस तू ही है, तूने ही सम्भालना है मुझे, ....मैं तेरे सामने कुछ नहीं....चाहे क़त्ल करके आ जाओ उसकी शरण में, वो माफ़ कर देगा, ....अब तुम डरो मत उस से। अब तुम्हारा स्टेट्स 'गॉड फियरिंग'  से 'गॉड लवर' कर लो.....और अगर कल को लगे तो गॉड सेवर या धर्मरक्षक कर लेना....बहुत सुखी रहोगे...कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता ...."


अब बनी बनाई दुकानदारियाँ कौन तुड़वाना चाहेगा....इसलिए पुजारी वर्ग ने बड़ी बड़ी चमत्कारिक कौतुक कथाएं लिख लिख कर नानक कबीर जैसे महापुरुषों को भी बदनाम किया, जो असल में हमारी ही तरह के इंसान थे, उन्हें भगवान के दूत या भगवान कह कर उनके नाम पर बड़े बड़े चमत्कारिक किस्से कथाएं साखियाँ लिख कर उनको इंसान भी नहीं रहने दिया........यहाँ तक कि उनके जन्म और मृत्यु में भी ट्विस्ट डाल दिया ताकि लोग यकीन कर सकें कि सच में एलियन ही थे वो, इस दुनिया के नहीं थे।....जबकि वो हमारी तरह इंसान थे, जिन्होंने अपने जीवन में दुःख भी संकल्प के साथ झेल कर हमें प्रेरणा दी।....


अगर वो भगवान होते तो जीते जी पुजारी वर्ग का विरोध क्यूँ झेलते......आज जो पुजारी वर्ग /धर्म का ठेकेदार वर्ग उनकी लाशों पर अपना कारोबार चला रहा है।.......क्या ऐसा होना सम्भव था ? धर्म एक विचारधारा न रह कर जैसे एक फुल फ्लेजड शॉपिंग मार्ट बन गया है। जहाँ 2 इंच के भगवान के फ़ोटू लगे हुए छल्ले से लेकर मूर्तियाँ, किताबें, मोती धागे, कैलेंडर सबकी रसीद कटती है, जो धीरे धीरे हमारी मानसिकता को भी काटती चली जाती है।.....हम बायस्ड होते चले जाते हैं। क्योंकि बचपन से बायस्ड ही पढ़ाया जाता है, सौ में से कोई एक आध बन्दा नास्तिक निकल भी आये तो उसके घर वाले ही कोस कोस कर मार देते हैं या उसकी सलामती के लिए पूजा पाठ करवाना शुरू कर देते हैं।


लेकिन यह विचारणीय है कि हमें जिस स्वरूप में इतिहास के समानांतर धर्म सम्प्रदाय का मसाला लिखा हुआ मिला वो कितना सच है। किस्सागोई की आदत तो ख़ैर इतिहासकारों को भी नहीं रही होगी। ......मेरा ख्याल है बात सारी ताकत और वर्चस्व की रही होगी। यहाँ तक कि इतिहासकारों की कनपटी पर भी बन्दूक रख कर जैसा लिखवाना चाहते थे वैसा लिखवाया गया, जैसे राजा महाराजाओं के समय में राजकवि /दरबारी कवि से आराधना या स्तुति लिखवाई जाती रही है। 


DrGurpreet Singh

Comments

Popular posts from this blog

मैंटल आधुनिकीकरण

बिंदी वाली गुड़िया

कैटरपिलर/ बम्बई डायरी/ 10-09-2016