टैगोर और उनका नोबेल

 



जाने क्या मजबूरी रही होगी या चारित्रिक विरोधाभास कि ऐसा कहने वाला शख़्स ही राष्ट्रगान जन गण मन भी लिख कर गया। जो शख़्स राष्ट्रीयता से ऊपर मानवता के अस्तित्व की पैरवी करता था, क्या ‘भारत भाग्य विधाता’ लिखते हुए उसके हाथ नहीं कांपे होंगे? एक प्रकृति प्रेमी कवि जो सभी अंतर्देशीय सीमाओं को तोड़ कर समूचे संसार को एक कुटुम्ब की परिकल्पना में जीने की हसरत रखता था क्या उसने कभी सोचा होगा कि जिस राष्ट्र नाम की संकल्पना को वो सिरे से ख़ारिज करता था, उसकी एक रचना ‘राष्ट्रगान’ अंतत उसे एक राष्ट्रकवि भी बना कर छोड़ेगी। मुझे अभी भी इस बात को सोच के इसमें किसी साज़िश की बू आती है कि जिस बात को हम जीते नहीं उसे हम लिखते भी नहीं , बल्कि वो बात हमसे किसी दबाव में ज़रूर लिखवाई जा सकती है। गुरुदेव की लिखी किताब “Nationalism “ पढ़ कर ये बात और भी स्पष्ट हो जाती है। 


दूसरी जो बात मेरे ज़ेहन में बचपन से बसी हुई है वो है इनका नोबेल पुरस्कार। हालाँकि मैं पुरस्कारों, तगमों, मेडल, फ़ेलोशिप में ख़ास यक़ीं नहीं रखता क्यूँकि ये आपका क़द बता सकते हैं लेकिन ये आपकी लोकप्रियता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकते। बचपन से एक उत्सुकता थी कि पहली बार किसी भारतीय साहित्यकार को जिस रचना के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया वो कैसी रही होगी। ‘गीतांजलि’ पढ़ कर क्या लगा या रचना की समीक्षा में जाने की बजाय आइए कुछ बिंदुओं पर चर्चा करूँ जो मेरे हिसाब से कारण बने गुरुदेव को नोबेल पुरस्कार दिलाने में।


1. बंगाल के सम्पन्न सवर्ण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए और उनके पिता ज़मींदार बाबू थे। जिनके मरणोपरांत भी टैगोर को महीने का ख़र्चा बँधा हुआ था यहाँ तक कि त्रिपुरा के महाराजा से भी प्रत्येक महीने बड़ी राशि आया करती थी। यही एक कारण था कि जब भारत अंग्रेजों का ग़ुलाम था और पूरा देश आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था, टैगोर को दुनिया के पाँच से ज़्यादा महाद्वीपों के तीस से ज़्यादा देशों की यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनका सवर्ण होना भी उस समय के छूआछूत वाले समाज में एक महत्वपूर्ण सामाजिक स्वीकृति देता है। 


2. रविंद्र का अंग्रेज़ी ज्ञान उन्हें ग़ैर यूरोपीय होते हुए भी उनकी रचनाओं को विश्व पटल तक ले गया। पिता ने बैरिस्टर बनने के लिए लंदन भेजा था, बैरिस्टर बन कर तो नहीं लौटे लेकिन 1912 में गीतांजलि लंदन से ही अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई।


टैगोर के ख़तों की किताब “Imperfect Encounter” में उनके अपने लंदन के प्रिय दोस्त William Rothenstein को लिखे ख़त में इस बात का ज़िक्र आता है कि उन्हें जब नोबेल पुरस्कार की ख़बर मिली तो वो बंगाल के जंगलों में अपने दोस्तों के साथ मोटर गाड़ी में कहीं जा रहे थे। उन्होंने विलियम के सामने यह बात भी स्वीकारी कि लोगों की बधाई के टेलीग्राम और ख़तों के अम्बार उनके व्यक्तित्व के नहीं बल्कि उस पुरस्कार के सम्मान में है।


टैगोर की अंग्रेजों से नज़दीकियाँ उनके ज़मींदार बाबू होने की वजह से थी या क्या लेकिन यह बात उन्हें 400 कहानियाँ लिख कर गुमनामी और ग़रीबी के अंधेरे में ज़िंदगी बसर करने वाले मरणोपरांत प्रसिद्ध कहानीकार प्रेमचंद से कहीं आगे रखती हैं। 


मंटो, शरदचन्द्र, निराला, प्रसाद, अमृता प्रीतम, दिनकर, महादेवी वर्मा, भीष्म साहनी , कमलेश्वर, मन्नू भंडारी, इस्मत, फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है लेकिन सवाल आज भी वहीं का वहीं खड़ा है कि क्या कमी थी और किसी भारतीय रचनाकार में जो एक सदी से ज़्यादा का समय बीतने पर भी किसी भारतीय लेखक को वो सम्मान नहीं मिल सका।


DrGurpreet Singh

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