ज़िंदगी- ख़ूबसूरत सच्चाई, मुहब्बत-दर्दनाक त्रासदी

 


ज़िंदगी परिभाषाओं की फ़ेहरिस्त है। तुम कौनसा किसी परिभाषा से कम हो। तुम्हें हर एक लफ़्ज़ के आयाम में मैंने देखा, लिखा और महसूस किया है।कई शक्लों में तुम्हारी तस्वीर को देखने की कोशिश में, मैं आज मैं ही नहीं रहा क्यूँकि तुम सभी सूरतों से अलाहिदा हो कर भी सभी में थोड़ी थोड़ी समाहित सी थी। जब जब तुमसे मुख़ातिब होता हूँ मैं तुम्हारी आँखों में यूँ देखता हूँ जैसे मैं तुम्हें नहीं तुमसे आगे कुछ देख रहा हूँ।फिर तुम जब शर्म से नज़रें झुका लेती हो, मैं किसी कटी पतंग सा तुम्हारे मन मंदिर के किसी टूटे पुराने से छज्जे पर आ कर अटक जाता हूँ। ज़िंदगी की इस से ख़ूबसूरत सच्चाई और मुहब्बत की इस से दर्दनाक त्रासदी क्या होगी कि तुम और मैं टूटे बाँधों से बेलौस बहते उन दो दरियायों से कम नहीं जो अपने अपने सच के बहाव में बस बहते जा रहे हैं।

19.08.2021 @Victoria Junction , Siliguri (Bagdogra Diary)

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