गर्व का टेलीस्कोप





पिछले काफ़ी दिनों से गर्व के दिमाग़ में टेलिस्कोप इस क़दर घर कर गया कि जब भी कोई पूछता कि क्या चाहिए तो जवाब होता “टेलिस्कोप”। सब कह देते कि इतना छोटा हो कर टेलिस्कोप का क्या करेगा। पर जैसे बालमन की मनुहार थी या ज़िद कि पिछले दिनों जीजाजी ने ला कर दे दिया टेलिस्कोप तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। सबसे पहले टेलिस्कोप के साथ फ़ोटो खिंचवाई फिर नानी मामा सबको फ़ोन लगा लगा कर बतलाया। जो भी सुनता तो कह देता कि वाह गर्व का टेलिस्कोप आ गया। गर्व भी आगे से चहक कर कह देता। “हुन आपाँ एहदे नाल स्टार्स ते प्लैनेट देखांगे। मैं एह्दे नाल सैटर्न देखूँगा। वड्डा सारा जूपिटर वी देखूँगा।” कभी कभार मेरे जैसा ख़ुराफ़ाती मामा जब पूछ बैठता कि “मेनू नहीं देवेंगा?” तो तपाक से जवाब तैयार मिलता कि “तेनु मामे मैं आप देख देख के दस्सी जाऊँगा।” 

ख़ैर आज बहन से बात हुई तो बोली “टेलीस्कोप ठीक ढंग से चला नहीं तो रिटर्न कर दिया ,बस याद रह गयी।”

मैं सोच में पड़ गया हूँ कि गर्व का कितना दिल दुखा होगा।


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