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उदासियों के पैरहन, परेशानियों के मौसम

दिन अकेला नहीं खलता, रात उदास हो या अकेली,बहुत खलती है। एक अदृश्य यात्रा है ज़िंदगी, जिसमें चले जा रहे हैं। कभी कभी लगता है इतनी धूप है कि सर जल जाए और कभी कभी लगता है कि इतना अँधेरा है कि एक पाँव भी आगे नहीं रखा जाता और साँस फूल जाएगी।  घुप अँधकार, परेशानियाँ, उदासी, नकारापन, इतना शोर कि नींद फ़ाख्ता हो जाती है। भावों से भरी गगरी अंतस् से आँखों में छलकने को हो आती है। तब लगता है कि कोई तो हो जो हाथ थाम कर एक बार कह दे कि “फ़िक्र ना करो, मैं हूँ तुम्हारे साथ…. हमेशा के लिए।” लेकिन लगता है कि ये अल्फ़ाज़ अगर कोई कह भी दे तो आँखें बरस जायेंगी। बहुत सारे कन्फ़ेशंस बहुत सारे बाँध एक झटके में टूट जाएँगे। ज़िंदगी मुस्कुराने की बजाय चीख चीख कर रो उठेगी। किसी ने कहा था कि ज़िंदगी सुंदर या आसान होती नहीं, बनानी पड़ती है। सही है, हमारे लिए हुए कुछ फ़ैसले ही हमें कभी सोने नहीं देते। जागते, सोते, उठते, बैठते, रोते, हँसते, बात करते या मौन हर समय एक टीस की माफ़िक़ हमारी छाती में लोटते हैं। हम चाहते हैं कि किसी के सामने अपनी ग़लतियों को कॉन्फ़ेस करें लेकिन सीने में वही ग़ुबार ताउम्र ढोते हैं।...

जॉन कीट्स और भगत सिंह

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  महबूब कवि है जॉन कीट्स। 25 की उम्र में इतना प्यार कमा गया जितना भगत सिंह 23 की उम्र में कमा कर गया। मुझे कभी कभी लगता है भगत सिंह अगर क्रांतिकारी और नास्तिक न हो कर एक रूमानी कवि होता तो वो बिल्कुल जॉन कीट्स जैसा ही होता। भगत सिंह की ख्याति दबाने के लिए उसे फांसी दी गयी। कीट्स जब मृत्यु शैय्या पर थे तब उनकी कविताएं किताबी रूप में छपने के लिए प्रकाशक प्रेस में गयी हुई थी और मृत्योपरांत उन्हें सम्मान मिला। जब 25 साल में ट्यूबरक्लोसिस से बहुत बीमार हुए तो  डॉक्टरों ने इटली जाकर रहने की सलाह दी    ताकि गर्म मौसम कुछ मददगार हो सके अलविदा कहते समय कीट्स को पता था वो अपनी beloved  फैनी से कभी नही मिल पाएंगे   उन्होंने अपने दोस्त से कहा, ‘अभी-अभी तो जीना शुरू किया था। अंदाजा नहीं था कि मौत इतनी जल्दी आ जाएगी  जब मैं मरूं तो मेरी कब्र पर लिखवाना: ‘यहां वह आदमी सोया है, ईश्वर ने जिसका नाम पानी पर लिखा था... रोम पहुंचने के कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई, उनके दोस्त के आखिरी शब्द थे वो पक्षी उड़ना भूल गया जो खुले आसमान में उड़ता था... ~DrGurpreet Singh...

पायलट रेना- असीम गगन की उन्मुक्त परी

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मेरी बड़ी भतीजी रेना 15 साल की उम्र में हवाईजहाज़ उड़ाना सीख रही है। हमारे रखरा ख़ानदान की शान। ❤️बहुत गर्व है इन बच्चों पर। आज इनकी बदौलत हम जहाज़ में सफ़र करने से जहाज़ उड़ाने वाले भी हो गये। आज चौथी बार अटलांटिक महासागर पायलट भतीजी रैना के साथ उड़ कर देखा। अकथनीय नज़ारा, शब्द कम पड़ जाएँ और आँखों के कैमरे ने फ़ोन के कैमरे से सुंदर स्मृतियाँ सहेज कर रख ली। खूब जीयो रेना। रब की मेहर और सुख रहे। 🙏🏻 -30.12.2022/ अमेरिका डायरी/ डॉ.गुरप्रीत सिंह #flying #atlanticocean #neiceandnephew #prouduncle #proudmoment #familytime #photography #oceanphotography #horizon #goodbye2022 #oceanview

ठंडी मौत

आजकल   मुझे   लगने   लगा   है   मेरे   अंदर   का   सारा   प्रेम   जैसे   सूख   गया   हो   और   मैं   किसी   सूखे   चश्मे   के   निशाँ   सा   पहाड़   की   सिल पर   अपने   प्रेम   का   वजूद   खोता   जा   रहा   हूँ।   लेकिन   मुझे   साथ   ही   यह   भी   लगता   है   कि   यह   निशाँ   कालांतर   में   अपूर्ण   प्रेम   का जीवाश्म   ज़रूर   बनेगा।किसी   सूखी   चमड़ी   के   निशाँ   सा   जिसकी   चोट   पहले   काफ़ी   समय   तक   लहू   लुहान   रिसती   रही   और फिर   उसमें   यादों   की   मवाद   इस   क़दर   भरती   गई   कि   एक   समय   के   बाद   वो   हर   धड़कन   हर   स्पंदन   से ...

मैंटल आधुनिकीकरण

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  बम्बई में काफ़ी समय व्यतीत करने के बाद अब दिल्ली या उत्तरी भारत की व्यवस्था पर हैरानी भी होती है और खीज भी आती है। बम्बई में बहुत सी चीजें इतनी सहजता  और सुगमता से उपलब्ध हैं कि उनके होने पर कभी शुकराना या gratitude महसूस करने की ज़हमत नहीं उठाई। दिल्ली सिर्फ़ शहर नहीं, दिल्ली इसकी भौगोलिक सरहदों तक है। जब भी दिल्ली के विकास की बात आती है वो सिर्फ़ समयपुर बादली से हुडासिटी सेंटर या वैशाली से नॉएडा बॉर्डर तक की बात करते हैं। कभी करनाल बायपास पर खड़े हो चारों ओर नज़र घुमा कर देखो, क्नाट प्लेस वाले सफ़ेद गलियारे ज़ेहन से उड़न छू हो जाएँगे। कभी बदरपुर बॉर्डर की कच्ची बस्तियाँ देखो, अकबर रोड की ठंडी हवा की मिसाल देनी भूल जाओगे। दिक़्क़त ये है कि विकास सिर्फ़ वहीं तक आ रहा जहाँ तक मेट्रो आ रही। विकास कब से मेट्रो का मोहताज़ होने लगा। जब भी दिल्ली आता हूँ दिल्ली के चेहरे में से बेरोज़गारी वाली दिल्ली को उघाड़ने की कोशिश करता हूँ। लगता है कोई कोई कोना बिल्कुल वैसा है जैसा छोड़ा था। बिल्कुल हमारे अंतर्मन के उन अंधेरे कोनों जैसा जायज़ नाजायज़ के बीच की परिभाषा को तलाशता। हम लाख भाग ले...

नानक से गुरु नानक

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नानक और कबीर समकालीन थे और भी कई मायनों में इनका कोई सानी नहीं। ये दोनों ही किसी राजा के बेटे नहीं थे। ना किसी संप्रदाय के प्रणेता या प्रचारक ही थे।  इनका संप्रदाय था समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों की फफूँद को साफ़ कर उजियारा करना। ठगी, बेईमानी, हिंसा, क्रोध, द्वेष के भेद खोल कर जनमानस को मानवता का पाठ पढ़ाना। यही बात नानक को गुरु नानक बनाती है।  वो व्रत जैसे आडम्बरों का विरोध करते कहते हैं। “छोडै अन्न करै पखंड,  ना ओ सुहागन ना ओ रंड” यही बात गुरु नानक को दुनिया के सबसे नवीनतम, सबसे एडवांस सबसे अप्डेटेड संप्रदाय का संस्थापक मानती है। नानक और कबीर अपने समय के सिर्फ़ संत नहीं थे, वे संत भी हैं और स्कॉलर भी। विचारक भी हैं, तर्कशील भी।  “ख़सम विसारे ते कमजात  नानक नावै बाझ सनात” वे सदी से आगे की बात करने वाले वैज्ञानिक भी हैं और दार्शनिक भी। वो फ़ेमिनिस्ट भी हैं और फ़िलैन्थ्रॉपिस्ट भी। नारी के लिए वे लिखते हैं। “सो क्यों मंदा आख़िए जित जम्मे राजान।” ( उसे क्यूँ बुरा कहना जिसने राजाओं तक को पैदा किया है) वे बाबर जैसे शासक का अहंकार तोड़ने के लिए उसकी जेल में क...

घड़ी की आँखमिचोली

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 साल 2016-17 के दिन थे जब हाथ की घड़ी बार बार रुक रही थी। उन दिनों मेरी क़लम काग़ज़ पर सिर्फ़ दर्द लिख लिख बरस रही थी। कुछ ना लिखने की कोशिश में भी बहुत कुछ लिखा जाता था। बेइतबारी का आलम ये था कि मैं रुकी हुई घड़ी ही देखना चाहता था। घड़ी कभी ना कभी अपने कर्तव्य से विमुख हो जाती और मैं उस दुर्लभ क्षण को पकड़ ही ना पाता। अंतर्मन की व्यथा थी या क्या कि एक शाम ऑफ़िस से आ कर नवीं मुंबई में ही एक डॉक्टर के पास चला गया और उसने झटपट मुझे एक इंजेक्शन लगा दिया। पैसे दे कर जाने लगा तो शायद मेरी समझ का सदक़ा उसने मुझे यूँ ही अपने पास बैठा लिया और पूछने लगा कि क्या आप कोई ‘क्रीएटिव वर्क’ भी करते हैं? .....मेरे टालने के बावजूद वो सज्जन पूछने पर उतारू थे। ख़ैर मैं मान गया कि मुझे लिखने का शौक़ है, बस और कुछ नहीं। तो इस बात पर वो थोड़ा और ठीक सा बैठ कर मुझसे मेरे लेखन , डायरी , कविताओं के बारे में पूछने लगे। इतना सब मेरे लिए काफ़ी था , मैंने बताना शुरू किया कि आजकल सिर्फ़ gloomy stuff लिख रहा हूँ। चारों ओर उदासी नज़र आ रही है। अंदर से ख़ाली सा महसूस कर रहा हूँ लेकिन फिर भी इतनी ताक़त ज़रूर बची है ...