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Showing posts from May, 2021

टैगोर और उनका नोबेल

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  जाने क्या मजबूरी रही होगी या चारित्रिक विरोधाभास कि ऐसा कहने वाला शख़्स ही राष्ट्रगान जन गण मन भी लिख कर गया। जो शख़्स राष्ट्रीयता से ऊपर मानवता के अस्तित्व की पैरवी करता था, क्या ‘भारत भाग्य विधाता’ लिखते हुए उसके हाथ नहीं कांपे होंगे? एक प्रकृति प्रेमी कवि जो सभी अंतर्देशीय सीमाओं को तोड़ कर समूचे संसार को एक कुटुम्ब की परिकल्पना में जीने की हसरत रखता था क्या उसने कभी सोचा होगा कि जिस राष्ट्र नाम की संकल्पना को वो सिरे से ख़ारिज करता था, उसकी एक रचना ‘राष्ट्रगान’ अंतत उसे एक राष्ट्रकवि भी बना कर छोड़ेगी। मुझे अभी भी इस बात को सोच के इसमें किसी साज़िश की बू आती है कि जिस बात को हम जीते नहीं उसे हम लिखते भी नहीं , बल्कि वो बात हमसे किसी दबाव में ज़रूर लिखवाई जा सकती है। गुरुदेव की लिखी किताब “Nationalism “ पढ़ कर ये बात और भी स्पष्ट हो जाती है।  दूसरी जो बात मेरे ज़ेहन में बचपन से बसी हुई है वो है इनका नोबेल पुरस्कार। हालाँकि मैं पुरस्कारों, तगमों, मेडल, फ़ेलोशिप में ख़ास यक़ीं नहीं रखता क्यूँकि ये आपका क़द बता सकते हैं लेकिन ये आपकी लोकप्रियता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकते...

पूजा- अर्चना अरदास और धर्म स्वरूप , भारत के परिप्रेक्ष्य में।

 आराधना , पूजा, अरदास या उस्तत किसी भी लफ्ज़ में उस अलौकिक शक्ति(जो किसी ने आज तक न देखी न महसूस  की) के सामने गिड़गिड़ाना या विनती करना आध्यात्म का अंग रहा है, वही आध्यात्म जो तथाकथित धर्म की दुकानों और उनके सिपहसालारों ने नियमबद्ध करके धर्म का डरावा दे कर हमारे सिर पर मढ़ा।.......किसी शिशु के पैदा होते ही उसके मस्तिष्क के विकसित होने से पहले ही उसे .....बेटा जय बोलो अंकल को, बेटा सतश्रीअकाल बोलो, बेटा ये बोलो बेटा वो बोलो,....करके उसको धर्म की शिक्षा के नाम पर डरावे वाली चीज़ें उसके हार्डवेयर में इंस्टाल करके दे देते हैं।....... बचपन में अगर वो कुछ तार्किक सवाल करे भी तो बस ये कह कर चुप करवा दिया जाता है, अरे बेटा ! ऐसा नहीं बोलते, पाप लगेगा, फ़ेल हो जाओगे परीक्षा में...चलो सॉरी बोलो रब जी को ।.... फिर जब कुछ सालों बाद उसका मन किसी तरह धर्म के ट्रैक पर आ जाता है तो फ़िर उसे प्यार करना बताया जाता है कि.... "बेटा ! सुनो! ...जैसा कि अब तुम अरदास करते हो, ...उस अलौकिक शक्ति को मस्का लगाते हो, उसको रोज़ सुबह उठ कर बोलते हो कि बस तू ही है, तूने ही सम्भालना है मुझे, ....मैं तेरे सा...

‘पाखंडी 'फ़ीनिक्स'

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 हर रात  मेरा ठंडा पड़ चुका शरीर, सुबह तक  जब स्वप्नलोक की यात्रा से लौटता है। मैं सो कर नहीं, जी कर उठता हूँ...... और तुम हो कि हर बार हँस कर  कह देती हो....... ....- पाखंडी 'फ़ीनिक्स'। और मैं तुम्हारे इस  उपहास पर भी इतरा जाता हूँ। .....जानता हूँ ....... इस बात में ही  हमारा रिश्ता छिपा है। ©डॉ.गुरप्रीत सिंह

कहीं ना पहुँच सकने वाले रास्ते

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      तुम जाने की बात कर रही हो? - मैं आई ही कब थी?.... और जिस दिन जाना होगा ना तुम्हें पता भी नहीं चलेगा.... -हम्म..... सुनो -हम्म.... बोलो -कुछ नहीं। -बोल दीजिये। -.......कुछ नहीं। -मेरे साथ चलोगी?? -मेरे साथ आपका कोई रास्ता नहीं है.... ठीक है?....तो ऐसी बात किया ना करो जो पॉसिबल ना हो..... उसकी यह बात सुन उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि उसके साथ वो चल सकता है....लेकिन कहीं पहुंच नहीं सकता......लेकिन अगले ही पल उसका मन हुआ कि उसे कह दे ......कि मुझे तुम्हारे साथ किसी रास्ते की जरूरत नहीं पड़ेगी.....न कहीं पहुंचने की जरूरत पड़ेगी।..... तुम्हें मिलना ही मेरे लिए मंजिल पहुंचने जैसा है....मैं चाहे तुम्हारा चाँद नहीं, लेकिन तुम ही मेरा मुकम्मल आसमां हो.....जहाँ से हम चलेंगे नहीं,...सिर्फ उड़ेंगे।......उसे लगा उसके सारे नादां सपने उस पर अट्टहास कर रहे हैं......और उसके आस पास की हवा कसैली हो उसका दम घोंट रही है। -क्या सोच रहे हो?? -कुछ नहीं -अपना ख्याल रखना -ह्म्म्म....    आप भी अ प ना... शब्द जैसे उसके गले में कहीं अटक गए। DrGurpreet Singh #प्रेम_के_वो_दिन

“टी -शर्ट में अच्छे लगते हो।"

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  “टी -शर्ट में...अच्छे लगते हो।"  उसे याद आया जब एक बार बड़े प्यार से उसने उसकी ओर देख कर हौले से कहा था। और उस वक़्त उसे लगा था जैसे उन दोनों के बीच पड़ी 'गार्लिक ब्रेड' पर किसी ने शरबत उड़ेल दिया हो।.....दरम्यां पड़ी कोल्ड कॉफी और भी मीठी हो गई हो।.....  उसे याद आया जब वो उस से मिलने के लिए तैयार हो रहा था, कैसे उसने जल्दी जल्दी में एक पैर की जुराब उलटी पहन ली थी, .... जाने कितना परफ्यूम गर्दन पर उड़ेल लिया था, .... और कमरे से बाहर निकलते हुए कैसे उसका पैर दरवाजे से टकरा गया था.....कार चलाते हुए कैसे उसकी साँसे फूली हुई थी......और इस कैफ़े पर उस से पहले पहुँच कर उसका इंतज़ार करना उसे कितना मुश्किल लग रहा था.... जिंदगी के किसी इम्तेहान में उसकी धड़कन इतनी तेज ना हुई थी जितनी तब थी..... उसे ये भी याद आया जब अपनी आदत से मजबूर उसने उससे वही सवाल पूछा था "रात सो गए थे??" और वो झुँझला कर बोल उठी थी "कॉपी पेस्ट कर लो आंसर" और वो चिरपरिचित अंदाज में बस 'ह्म्म्म' कह पाया था। उसे ये भी याद आया एक बार उस पर गुस्सा करते हुए वो खुद ही बोल पड़ी थी,  "...