टैगोर और उनका नोबेल
जाने क्या मजबूरी रही होगी या चारित्रिक विरोधाभास कि ऐसा कहने वाला शख़्स ही राष्ट्रगान जन गण मन भी लिख कर गया। जो शख़्स राष्ट्रीयता से ऊपर मानवता के अस्तित्व की पैरवी करता था, क्या ‘भारत भाग्य विधाता’ लिखते हुए उसके हाथ नहीं कांपे होंगे? एक प्रकृति प्रेमी कवि जो सभी अंतर्देशीय सीमाओं को तोड़ कर समूचे संसार को एक कुटुम्ब की परिकल्पना में जीने की हसरत रखता था क्या उसने कभी सोचा होगा कि जिस राष्ट्र नाम की संकल्पना को वो सिरे से ख़ारिज करता था, उसकी एक रचना ‘राष्ट्रगान’ अंतत उसे एक राष्ट्रकवि भी बना कर छोड़ेगी। मुझे अभी भी इस बात को सोच के इसमें किसी साज़िश की बू आती है कि जिस बात को हम जीते नहीं उसे हम लिखते भी नहीं , बल्कि वो बात हमसे किसी दबाव में ज़रूर लिखवाई जा सकती है। गुरुदेव की लिखी किताब “Nationalism “ पढ़ कर ये बात और भी स्पष्ट हो जाती है। दूसरी जो बात मेरे ज़ेहन में बचपन से बसी हुई है वो है इनका नोबेल पुरस्कार। हालाँकि मैं पुरस्कारों, तगमों, मेडल, फ़ेलोशिप में ख़ास यक़ीं नहीं रखता क्यूँकि ये आपका क़द बता सकते हैं लेकिन ये आपकी लोकप्रियता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकते...