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Showing posts from June, 2020

तेरा जाना

कभी कभी मुझे लगता है मेरे अंदर, इतनी बेइंतहा मुहब्बत भरी हुई है कि इसका ग़ुबार मेरी छाती में धड़कते दिल को ले डूबेगा। मेरी साँसों में इतनी उथल पुथल मचा देगा कि मुझे, तेरा यूँ चले जाना जीवन और मृत्यु के बीच का इक महीन सा वो रेशमी क्षण लगेगा जो मेरी इकतरफ़ा, अनकही ,ज़ख़्मी मुहब्बत ने तेरे जाने की बेबसी में बुना होगा। और अब मुझे ये भी लगता है कि मेरी मुहब्बत का ये पागल सा रेशमी कीड़ा सारी उम्र सुर्ख़ नज़्मों के धागे बुनता रहेगा। और ज़ख़्मों की पैरवी करती मेरी ये ज़िंदगी तुझे ना रोक पाने की बेबसी का मातम मनाती रहेगी। धागा मेरी अंगुलियों पर लिपटता सुर्ख़ से स्याह हो जाएगा रंग मुहब्बत का भी यूँ गहरा और गहरा हो जाएगा। बस अब चाहता हूँ कि तेरे बग़ैर तमतमाता ये यौवन, किसी भी सूरत में काल-गर्त ना हो, ज़िंदगी की किसी तपती दोपहर ये आसमा मेरे हिस्से की सारी धूप एक घूँट में ही पी ले। फिर काल गर्जना के साथ स्याह मेघ तले ‘प्रीत’ अपने घर चला जाएगा। DrGurpreet Singh

‘अभिमान’ की स्वाभिमानी ‘जया’

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आज Father’s day पर संयोगवश ‘मेल ईगो‘ पर बनी ख़ूबसूरत फ़िल्म ‘अभिमान’ (1973) देखी। इस फ़िल्म के गाने मुझे बहुत पहले से ही पसंद थे। कहानी भी सुन रखी थी लेकिन शुरू से अंत तक देखने का मौक़ा आज मिल ही गया। ..... इस फ़िल्म के बारे कुछ कहने की बजाय मैं बस ‘जया भादुरी’ जी की बात करूँगा। हाँ ‘भादुरी’....क्यूँकि बचपन से आज तक मैं उनको बच्चन जी के कारण नहीं अपितु उनकी शख़्सियत और अभिनय के कारण तवज्जो देता आया हूँ। पुरानी अभिनेत्रियों में मेरा क्रश रही हैं जया। .....उनका सादगी भरा चेहरा कुछ ना बोले भी उदासी में मुँह फेर ले या एकदम से प्रेम अनुरागित हो नायक को तक ले तो कलेजा आज भी मुँह को आ जाता है।.....याद है मुझे ‘मिली’ फ़िल्म देखते समय मैं बारह पंद्रह बार रोया था। और इसी क्रम में ‘परिचय’ ‘चुपके चुपके’ और ‘सिलसिला’ फ़िल्में देख डाली थी। उनकी सादगी मुझे आज भी इतना परेशान कर देती है कि कोई इतना सरल कैसे हो सकता है। सोच रहा हूँ एक शांत निर्मल नदी सरीखी आँखों से तकती उनकी शख़्सियत जब सादगी से फ़िल्म के संवाद बोलती होगी तो डायरेक्टर टीम ‘कट’ बोलना ही भूल जाती होगी। है ना? कितना मुश्किल रहा होगा न...

मेरे दादाजी - सरदार अमर सिंह जी

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आज मेरे दादाजी सरदार अमर सिंह जी का जन्मदिन है और आज मन कर रहा है आप सब से उनके बारे में बहुत कुछ साझा करने का। उन्हें हम प्यार से पापाजी ही बुलाते थे। उनका जन्म 20 जून 1925 को सरदार महँगा सिंह जी के घर पंजाब के फिरोज़पुर जिले के मुद्दकी गाँव में हुआ। बचपन में एक दो बार दादाजी हमें वहाँ अपने गाँव लेकर भी गए थे। किसी रिश्तेदार की शादी थी और हमें उत्साह था छुट्टी और दादाजी के जन्मस्थान को देखने का। हम बच्चे जब प्यार से दादाजी से पूछते कि ये मुद्दकी कौनसी जगह है तो वो बड़ी रौ में उत्तर देते, वही ऐतिहासिक मुद्दकी गांव जहाँ पर 1845 में सिक्खों और अंग्रेजों के बीच ‘मुद्दकी की जंग’ लड़ी गई थी। शहीदों की याद में अब गुरुद्वारा कत्लगढ़ उसी मैदान-ए-जंग की जगह पर ही बना हुआ है जहाँ हम घूम कर आये और खूब सी यादें स्मृतिपटल की पोटली में भर लाये। बीकानेर रियासत के राजा गंगा सिंह बहादुर ने बीकानेर के विस्तार और समृद्धि के लिए पश्चिम विस्तार नीति के तहत बहावलनगर जिले के अरक्षित इलाके को एक शहर के रूप में बसाने का सोचा। सतलुज के पानी को हेड कैनाल बना कर लाने का कार्य शुरू हुआ। 1927 में वायसरॉय लॉर्...

सादुलशहर वाले बच्चे

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मेरी प्यारी छोटी बहन चितवन और बाकी के चचेरे भाई बहन। आज हालाँकि इनसे पहली बार मिलने का मौका मिला लेकिन दो मिनट में ही ऐसे घुल मिल गए मुझसे कि जैसे बरसों से साथ हों। कुछ रिश्तेदार ऐसे होते हैं ना जिनसे कभी मिलने का मौका नहीं मिल पाता लेकिन जब मिलते हैं तो लगता है कि पहले क्यों नहीं मिले। आज ऐसे ही दादी के चचेरे भाई मग्गर सिंह बाबा जी के घर सादुलशहर जाने का मौका मिला। मुझे बच्चों और बुजुर्गों से विशेष लगाव है। उनके और उनकी रुचियों के बारे में जानना मुझे बहुत अच्छा लगता है।.....छोटे बच्चों की बातें, उनका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया और उनके सपने ये सब मुझे विशेष रूप से उनसे जोड़ते हैं। आज इन बच्चों के साथ कुछ समय बिता कर रूह को इतना सुकून मिला कि मैं बस निःशब्द सा इन्हें सुनता रहा और ये अधिकारपूर्वक बस अपनी अपनी बात कहते चले गए। कोई मेरे साथ बॉल खेला तो किसी ने मुझे मोबाईल पर वीडियो एडिट करनी बताई। मेरे जाते ही ये जो भी ताश वग़ैरह खेल रहे थे, एकदम से छोड़ कर मेरे पास आ कर बैठ गए। चितवन सबसे छोटी हो कर भी सब पर भारी पड़ रही थी, किसी को आगे नहीं आने दे रही थी। गुरमन को आर्ट एंड क्राफ्ट क...

हेडमास्टर मग्गर सिंह जी के साथ सुनहरी दोपहर

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मेरी दादी के चचेरे भाई 'मग्गर सिंह' (बाबा जी) के साथ सादुलशहर में बिताई आज 19 जून 2020 की दोपहर। मुझे बचपन से ही बुज़ुर्ग और बच्चे बहुत लुभाते हैं उनसे बात करना ,उनके बारे में जानना बहुत अच्छा लगता है। आज सादुलशहर जाने का मौका मिला और एक बार फिर मैं अपनी जड़ों से जुड़ गया।मेरी दादी प्रकाश कौर के चचेरे भाई मग्गर सिंह (बाबा जी) से मिलने का मौका मिला और मैं उनके साथ बात करते हुए 1935 में चला गया। जी हाँ, 1935 में ही बाबा मग्गर सिंह जी का जन्म चक नूरसर , तहसील चिश्तियाँ, जिला बहावलनगर, पंजाब प्रांत (अविभाजित भारत) में हुआ था। बताने लगे  भारतीय तक़सीम के समय इनकी उम्र कोई 12 साल रही होगी जब ये अपने परिवार के साथ  बैलगाड़ी पर नवनिर्मित पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़ हिंदुस्तान के राजस्थान में आ गए और यहीं श्रीगंगानगर के खालसा स्कूल से आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की। फिर प्राइवेट मैट्रिक की परीक्षा पास करके बेसिक ट्रेनिंग (बी एस टी सी) का कोर्स कर लिया। 1960 में आप राजस्थान सरकार के अंतर्गत प्राईमरी स्कूल में अध्यापक के पद पर कार्यरत हुए और अंततः 1995 में हेडमास्टर के पद से सेवानिवृत...

और कितने सुशांत होंगे शांत

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कुछ दिन पहले मैं काफी डिप्रेस था। मन में बुरे बुरे ख़्याल घर कर रहे थे। मरने तक का सोच लिया था मैंने। फ़ेसबुक पर मेरे किए पोस्ट भी इस बात की गवाही दे रहे थे। हो सकता है आप में से कई लोग इस पोस्ट को पूरा न पढ़ें ,पर मैं आज सब कुछ लिखूँगा। क्योंकि ज़रूरी है कहना, आप सभी को उस असलियत से रूबरू करवाना जो मैंने खुद पर झेली। Sink कर रहा था मन कहीं डूबता सा। हर ढलती शाम आखरी जान पड़ती है ऐसे समय और हर उगता दिन बेवज़ह नाज़ायज सा। किसी काम में मन नहीं लगता, ज़िंदगी एकदम नीरस। चलते चलते एक ऐसी जगह पर पहुँच जाता है मन, जहाँ से आगे कोई मील का पत्थर हमें नहीं पुकारता। हर वक्त रोने का मन करता है बेवज़ह। बाहरी रूप से एकदम भला चंगा दिख सकता है इंसान। इसीलिए लोग समझते हैं कि अच्छा भला तो था एकदम से क्या हो गया। सुशांत सिंह राजपूत जो कुछ घण्टों पहले इस दुनिया को अपनी मर्ज़ी से छोड़ गए और उसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों की टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गयी। "ये नहीं करना था"......"this is not done"......."Wtf"... ...."ये क्यूँ किया"........."please come bac...

14 जून -शहर नहीं छूटता- नागपुर शहर

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तेरे शहर में  आखिरी रात, जैसे चाय के  जूठे प्याले में बची  आखिरी घूँट। हम शहर को छोड़ते हैं, शहर हमें कभी नहीं छोड़ता, कहीं का नहीं छोड़ता।....नागपुर शहर जिसमें मेरी पहली नौकरी लगी थी, आज उसे छोड़े हुए चार बरस हो गए। समय कितनी तेजी से दौड़ता है ना। 14 जून 2016 नागपुर ऑफिस (भारत सरकार) से रिजाइन दे कर 15 जून 2016 को बम्बई शहर में दूसरी (भारत सरकार की) नौकरी जॉइन करनी थी।...मन में उत्साह भी था और घबराहट भी। उत्साह था नौकरी का और घबराहट थी सबसे बड़े शहर की आपाधापी की। हालाँकि बम्बई ने जो इन सालों में सिखाया वो शायद हिंदुस्तान का और कोई शहर न सिखा पाता पर ये बात नागपुर छोड़ते हुए समझ में आई कि नागपुर की गर्मी और अल्प विकसित शहरीकरण की जितनी दुहाइयाँ देता आया था सब उस दिन बेमानी हो गई, जब 14 जून 2016 को ऑफिस में रिजाइन देने के बाद रेसिग्नशन लेटर हाथ में आने वाला था, तब मन कर रहा था कि काश कुछ हो जाये....कोई एक बार थोड़ा सा रोक ले। कहीं नहीं जाना ...यहीं रहना है।....पर जब बम्बई से अमृतसर इंटेलीजेंस में गया तो लगा नियति यही होती है ....हम शहरों को छोड़ते हैं,...

09 जून - गर्व का जन्मदिन

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आज मेरे भाँजे गर्व प्रताप का चौथा जन्मदिन है। मुझसे बहुत निकटता होने के कारण गर्व मुझे बहुत प्यारा दुलारा भी है। फ़ेसबुक पर यदाकदा उसकी अठखेलियों और नन्हे मासूम वाकयों का ज़िक्र फ़ोटो सहित करता ही रहता हूँ। यहाँ मेरे लाडले के लिए लिखी मेरी इक नज़्म ही साझा करूँगा, ये नज़्म मेरे ज़ेहन में तब उतरी जब एक बार कार में मेरी गोद में सफ़र करते हुए मैंने अपनी घड़ी गर्व के हाथ में बाँध दी थी। उस दिन तुम्हारे हाथ पर बँध, तुम्हारी नन्ही सी कलाई का स्पर्श पा मेरी ये घड़ी सच में कुछ पल के लिए रुक गई थी। तुम्हारी ज़िद जैसे कई काल खंड एक साथ कायनात की सारी नेमतें ले कर उस पल मेरी घड़ी में एक साथ धड़क गये हों जैसे ....... मेरी धड़कन ....मेरे गर्व! ~तुम्हारा मामा DrGurpreet Singh.....मेरी रूह की खुराक को जन्मदिन मुबारक हो। बहुत ऊँचा उठो बहुत तरक़्क़ी करो।

शुभ मंगल ज़्यादा सावधान- फ़िल्म समीक्षा

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बॉलीवुड के ‘टेबू मैन’ आयुषमान खुराना की एक और टैबू बेस्ड फ़िल्म। आयुषमान ने आज तक ज़्यादातर सामाजिक विषयों पर ही फ़िल्में की हैं और अपनी फ़िल्मों और अभिनय से किसी ना किसी संदेश को जनमानस तक पहुँचाने में अब तक सफल भी रहे हैं। “शुभ मंगल ज़्यादा सावधान” फ़िल्म भी ‘पुरुष समलैंगिकता’ जैसे संवेदनशील विषय पर ही आधारित फ़िल्म है। ऐसी बात नहीं है कि भारतीय फ़िल्म जगत की पृष्ठभूमि और इस देश की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसी फ़िल्म बनाई ही नहीं जा सकती वरन इससे पहले भी कई बार इस विषय को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यदाकदा किसी ना किसी फ़िल्म के कथानक या चरित्र के ज़रिए दर्शाया जाता रहा है और आजकल की मल्टीस्टारर फ़िल्मों में यह कोई बड़ी बात भी नहीं लेकिन जब विशेष रूप से इसी विषय पर केंद्रित कोई फ़िल्म बनाने की बारी आती है तो या तो फ़िल्म में गम्भीर मसाला ज़्यादा डाल दिया जाता है या हँसी के फ़व्वारों में विषय की पटरी से फ़िल्म की कहानी अक्सर उतर जाती है। क़रीब 10-12 साल पहले इसी विषय पर आई फ़िल्म ‘दोस्ताना’ के बाद जब आयुशमान ने इस विषय का बीड़ा उठाया होगा तो उस फ़िल्म के मापदंडों को ए...

27 मई - नेहरू पुण्यतिथि

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कुछ दिन पहले घर की पुरानी चीज़ों को खंगालते ये तस्वीर मिली थी पंडित जवाहरलाल नेहरूजी की। तस्वीर है- 28 फरवरी 1963 की।..... पापा बताने लगे कि नेहरू तब हमारे शहर श्रीगंगानगर के दौरे पर आये थे और चूंकि पापा तब 13 साल के थे तो वो बड़े उत्साह से अपने दोस्तों के साथ नेहरू को हेलीकॉप्टर से उतरते देखने चले गए। बाद में बस स्टैंड के पास वाले पार्क में उनकी सभा भी थी, जहाँ मानो सारा शहर उमड़ पड़ा था।...... अभी नेहरू यहाँ की जनता को सम्बोधित कर ही रहे थे कि खबर मिली - "राजेन्द्र प्रसाद नहीं रहे।"..... पापा बड़ी याददाश्त के साथ बताते हैं कि नेहरू बाकी सभी कार्यक्रम स्थगित कर झटपट वापिस लौट गए। आखिर देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने देश के प्रथम सर्वोच्च पदधारी को श्रद्धांजलि देनी थी।.....एक भारत रत्न ने दूसरे भारत रत्न को अलविदा कहना था।........  ऐसे थे हमारे नेहरू। DrGurpreet Singh   #27_मई_नेहरू_पुण्यतिथि_विशेष